वट सावित्री व्रत की कथा और महत्व | Vat Savitri Vrat Kahani

जानिए सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कहानी, जिन्होंने यमराज से अपने पति के प्राण वापस पा लिए। वट सावित्री व्रत की संपूर्ण कथा व महत्व।

Vat Savitri Vrat Kahani

सनातन धर्म में अनेक ऐसे व्रत और त्योहार हैं जो पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते, समर्पण और अटूट विश्वास को दर्शाते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पावन व्रत है—वट-सावित्री व्रत। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि प्रेम सच्चा हो और संकल्प दृढ़ हो, तो साक्षात मृत्यु के देवता यमराज को भी झुकना पड़ता है। आइए जानते हैं सावित्री और सत्यवान की वह महान पौराणिक कहानी जिसने भारतीय संस्कृति में सुहाग की रक्षा के इस पर्व को अमर बना दिया।

सावित्री का संकल्प और सत्यवान का चयन

प्राचीन काल में मद्र देश के एक प्रतापी राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। वे अत्यंत धर्मात्मा और दयालु थे, परंतु उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने वर्षों तक कठिन तपस्या और यज्ञ किए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सावित्री देवी ने उन्हें दर्शन दिए और एक तेजस्वी पुत्री का वरदान दिया। समय आने पर राजा के घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम देवी सावित्री के नाम पर ही ‘सावित्री’ रखा गया।

सावित्री जैसे-जैसे बड़ी हुई, उसके रूप, गुण और बुद्धि की चर्चा चारों ओर फैलने लगी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो राजा अश्वपति ने उसे स्वयं अपने लिए वर चुनने की अनुमति दी। सावित्री ने अपने मंत्रियों के साथ देशाटन करते हुए वन में रह रहे राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। सत्यवान का परिवार अपना राज्य खो चुका था और अब वे अत्यंत सादगी से वन में कुटिया बनाकर रहते थे। सत्यवान अत्यंत सुशील, गुणी और माता-पिता की सेवा करने वाले युवक थे।

देवर्षि नारद की भविष्यवाणी

जब सावित्री ने अपने निर्णय के बारे में अपने पिता को बताया, तो उसी समय वहां देवर्षि नारद पधारे। राजा अश्वपति ने नारद जी को सावित्री के निर्णय से अवगत कराया। यह सुनते ही नारद जी अत्यंत चिंतित हो गए। उन्होंने राजा से कहा, “हे राजन! सत्यवान सर्वगुण संपन्न है, इसमें कोई संदेह नहीं है। परंतु वह अल्पायु है। विवाह के ठीक एक वर्ष पश्चात उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए सावित्री को अपना निर्णय बदल लेना चाहिए।”

राजा अश्वपति अपनी पुत्री को लेकर बहुत चिंतित हो गए और उन्होंने सावित्री को बहुत समझाया। परंतु सावित्री अपने संकल्प पर अडिग थी। उसने अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा, “पिताजी! हिंदू धर्म में कन्या केवल एक बार ही किसी का वरण करती है। मेरा हृदय सत्यवान को अपना पति स्वीकार कर चुका है। अब चाहे जो भी हो, मैं अपने मार्ग से पीछे नहीं हट सकती।”

अंततः राजा अश्वपति को अपनी पुत्री के दृढ़ संकल्प के आगे झुकना पड़ा और सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ धूमधाम से संपन्न हुआ।

यमराज का आगमन और सावित्री का पीछा

विवाह के पश्चात सावित्री राजसी ठाठ-बाट छोड़कर अपने सास-ससुर और पति के साथ वन की कुटिया में रहने लगी। वह अत्यंत सेवाभावी थी और उसने अपने मधुर व्यवहार से सभी का दिल जीत लिया। लेकिन सावित्री के मन में नारद जी की वह भविष्यवाणी हर क्षण गूंजती रहती थी। वह धीरे-धीरे दिन गिनती रही।

जैसे-जैसे वह अंतिम दिन नजदीक आने लगा, सावित्री ने तीन दिन पूर्व से ही निर्जला व्रत रखना शुरू कर दिया। अंततः वह दिन आ ही गया। उस दिन सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जंगल जाने लगा। सावित्री ने भी उसके साथ जाने की जिद की। सत्यवान के मना करने के बावजूद वह अपने सास-ससुर से आज्ञा लेकर सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल पड़ी।

जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में असहज और तेज दर्द होने लगा। वह व्याकुल हो गया। सावित्री ने उसे एक विशाल वट (बरगद) वृक्ष के नीचे लिटा दिया और उसका सिर अपनी गोद में रख लिया। देखते ही देखते सत्यवान के प्राण पखेरू उड़ गए। तभी वहां साक्षात मृत्यु के देवता यमराज प्रकट हुए। यमराज ने सत्यवान के शरीर से उसके सूक्ष्म प्राण को निकाला और उसे अपने पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करने लगे।

सावित्री और यमराज का अद्भुत संवाद

अपने पति के निष्प्राण शरीर को वट वृक्ष के नीचे छोड़कर सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। कुछ दूर जाने के बाद जब यमराज ने पीछे मुड़कर देखा, तो वे एक साधारण स्त्री को अपने पीछे आते देख चकित रह गए। यमराज ने कहा, “हे सावित्री! तुम यहीं से वापस लौट जाओ। मृत्यु के मार्ग पर जीवित मनुष्यों का आना वर्जित है। तुमने अपने पति का इस लोक में पूरा साथ निभाया, अब तुम्हारा कर्तव्य पूर्ण हुआ।”

सावित्री ने अत्यंत आदर और धीरता से उत्तर दिया, “हे धर्मराज! जहां मेरे पति जाएंगे, वहां जाना मेरा परम कर्तव्य है। सनातन धर्म के अनुसार पत्नी अपने पति की सहगामिनी होती है। मेरे पतिव्रत धर्म और आपकी कृपा के बल पर मुझे इस मार्ग पर चलने से कोई नहीं रोक सकता।”

सावित्री के मुख से धर्म और नीति की बातें सुनकर यमराज अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा, “पुत्री! मैं तुम्हारे पतिव्रत धर्म और ज्ञान से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम सत्यवान के प्राणों को छोड़कर मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग सकती हो।”

चतुर वरदान और सत्यवान का पुनर्जीवन

सावित्री ने अत्यंत बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए पहला वरदान मांगा, “प्रभु! मेरे अंधे सास-ससुर को पुनः आंखों की ज्योति प्राप्त हो जाए।” यमराज ने कहा, “तथास्तु!” और आगे बढ़ गए।

सावित्री फिर भी पीछे-पीछे चलती रही। यमराज ने पुनः उसे रोकने का प्रयास किया। तब सावित्री ने दूसरा वरदान मांगा, “हे देव! मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए और वे पुनः राजा बनें।” यमराज ने कहा, “तथास्तु!” और आगे चलने लगे।

जब सावित्री फिर भी पीछे चलती रही, तो यमराज ने कहा, “पुत्री, अब तुम वापस लौट जाओ।” तब सावित्री ने अपना तीसरा और अंतिम वरदान मांगा, “हे धर्मराज! मुझे सौ यशस्वी और पराक्रमी पुत्रों की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो।”

यमराज ने बिना अधिक सोचे-समझे शीघ्रता से कहा, “तथास्तु! तुम्हारी यह इच्छा भी पूर्ण हो।”

वरदान पाकर सावित्री ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक मुस्कुराते हुए यमराज से कहा, “हे न्यायप्रिय देव! आपने मुझे सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान तो दे दिया, परंतु एक सती स्त्री बिना अपने पति के किसी अन्य पुरुष के बारे में सोच भी नहीं सकती। अतः अपने इस वरदान को सत्य करने के लिए आपको मेरे पति सत्यवान के प्राण वापस लौटाने ही होंगे। अन्यथा आपका यह वरदान झूठा सिद्ध हो जाएगा।”

यमराज सावित्री की इस कुशाग्र बुद्धि, वाक्पटुता और अटूट प्रेम के आगे निरुत्तर हो गए। वे अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे सावित्री! तुम्हारी बुद्धिमत्ता और पतिभक्ति के आगे साक्षात काल भी पराजित हो गया है। मैं सत्यवान के प्राणों को मुक्त करता हूँ।”

यमराज के अंतर्ध्यान होते ही सावित्री तुरंत उसी वट वृक्ष के पास पहुंची जहां सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था। उसने जैसे ही सत्यवान का स्पर्श किया, सत्यवान गहरी नींद से जागने की तरह उठ बैठा। उसके चेहरे पर तेज वापस आ गया था। सावित्री के सास-ससुर की आंखों की रोशनी भी वापस आ गई और उन्हें अपना खोया हुआ राज्य भी मिल गया।

तभी से इस पावन स्मृति में हर वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट-सावित्री व्रत मनाया जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं, उसमें सूत लपेटती हैं और अपने पति की दीर्घायु तथा सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।


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