
कार्तिक मास की अमावस्या की वह घनी रात हर तरफ दीपों की रोशनी से जगमगा रही थी। गलियों में सजे रंग-बिरंगे बल्ब, घरों के द्वारों पर जलते मिट्टी के पारंपरिक दीये और हवा में तैरती तरह-तरह के पकवानों और मिठाइयों की भीनी-भीनी खुशबू—सब कुछ इस बात की गवाही दे रहे थे कि साल का सबसे बड़ा और पावन त्योहार, ‘दिवाली’ आ चुका है। हर घर में माँ लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं।
दस वर्षीय रोहित अपने नए रेशमी कुर्ते-पाजामे में शीशे के सामने खड़ा खुद को निहार रहा था। उसके चेहरे पर एक अद्भुत उत्साह और चमक थी। उसके लिए दिवाली का मतलब था—ढेर सारे पटाखे, स्वादिष्ट मिठाइयाँ, नए कपड़े और स्कूल की लंबी छुट्टियाँ। लेकिन इस साल उसकी दिवाली कुछ बेहद खास होने वाली थी, एक ऐसी सीख के साथ जो उसके जीवन की दिशा बदलने वाली थी।
घरों की सजावट और माँ की रंगोली
सुबह से ही घर में चहल-पहल थी। रोहित की माँ ने मुख्य द्वार पर गेंदे के फूलों और आम के पत्तों से सुंदर तोरण सजाया था। आँगन के बीचों-बीच उन्होंने रंग-बिरंगे रंगों और फूलों से एक बड़ी ही सुंदर रंगोली बनाई थी। रोहित भी अपनी माँ की मदद कर रहा था और बार-बार अपनी पटाखों की थैली को देख रहा था जिसे उसके पिता ने एक दिन पहले ही खरीदा था।
शाम होते ही पूरा घर दीपकों की कतारों से सज गया। ऐसा लग रहा था मानो आसमान के तारे ज़मीन पर उतर आए हों।
दादी माँ की सीख और धर्म का असली महत्व
जब लक्ष्मी पूजा का समय हुआ, तो रोहित दौड़कर पूजा के कमरे की तरफ भागा। वहाँ उसकी दादी माँ भक्तिभाव से डूबी हुई माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश की आरती कर रही थीं। पूजा समाप्त होने के बाद, दादी माँ ने सबको प्रसाद बाँटा।
“दादी माँ! अब जल्दी चलिए, हमें बाहर दीये भी तो रखने हैं और फिर मुझे पटाखे भी जलाने हैं!” रोहित ने उतावलेपन से अपनी दादी का हाथ खींचते हुए कहा।
दादी माँ ने प्यार से मुस्कुराते हुए रोहित के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “हाँ बेटा, हम अभी चलेंगे। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि हम यह दीये क्यों जलाते हैं और इस त्योहार का असली धार्मिक महत्व क्या है?”
“हाँ दादी माँ, मुझे पता है! आज ही के दिन भगवान श्री राम लंकापति रावण पर विजय प्राप्त कर और अपना चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे। उनके आने की खुशी में अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाकर उनका स्वागत किया था,” रोहित ने गर्व से उत्तर दिया।
“तुमने बिल्कुल सही कहा, बेटा,” दादी माँ ने गंभीर होते हुए कहा। “लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि भगवान राम ने हमें क्या सिखाया? उन्होंने हमें ‘धर्म’ की राह पर चलना सिखाया। धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं है, बल्कि कमजोरों की मदद करना, दया भाव रखना और सबके जीवन से अंधकार को मिटाना है। हमारी दिवाली तब तक अधूरी है, जब तक हमारे आस-पास कोई भूखा या दुखी है। असली रोशनी वह है जो किसी के उदास चेहरे पर मुस्कान ला दे।”
खिड़की से बाहर का एक अलग संसार
दादी माँ की यह बात रोहित के बाल-मन में गहराई तक उतर गई। वह कुछ सोचने लगा और टहलते हुए बैठक की बड़ी खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर रंग-बिरंगी आतिशबाज़ी से आसमान सतरंगी हो रहा था। तभी उसकी नज़र सड़क के उस पार बनी एक अस्थाई झोपड़ी पर पड़ी। वहाँ एक गरीब मजदूर का परिवार रहता था जो पास की ही एक निर्माणाधीन इमारत में काम करता था।
उस झोपड़ी के बाहर केवल एक छोटा सा मिट्टी का दीया टिमटिमा रहा था, जो तेल की कमी और ठंडी हवा के झोंकों के कारण बार-बार बुझने की कगार पर पहुँच जाता था। वहाँ रहने वाला आठ साल का लड़का, राजू, फटे हुए कपड़ों में चुपचाप खड़ा होकर आसमान में फूटते हुए महंगे पटाखों को बड़ी ही हसरत भरी नज़रों से देख रहा था। उसके पास न तो नए कपड़े थे, न मिठाई और न ही कोई पटाखा।
रोहित को अचानक दादी माँ के शब्द याद आए—”असली रोशनी वह है जो किसी के उदास चेहरे पर मुस्कान ला दे।”
मानवता का पहला कदम
रोहित का संवेदनशील दिल पसीज गया। उसने तुरंत एक फैसला लिया। वह रसोईघर की तरफ भागा और अपनी माँ से कहा, “माँ, क्या आप मुझे एक बड़ी थाली में ढेर सारी काजू कतली, बालूशाही और कुछ नए दीये दे सकती हैं?”
माँ ने हैरान होकर पूछा, “लेकिन क्यों बेटा?”
“माँ, मैं अपनी दिवाली को और भी रोशन करना चाहता हूँ,” रोहित ने कहा। माँ उसकी मंशा समझ गईं और उन्होंने मुस्कुराते हुए एक बड़ी थाली सजा दी। रोहित ने उस थाली में अपने पटाखों के डिब्बों में से कुछ फुलझड़ियाँ, चकरघिन्नी और अनार भी रख लिए।
रोहित दौड़कर सड़क पार गया और राजू के पास जाकर खड़ा हो गया। राजू अचानक एक अमीर घर के लड़के को अपने सामने देखकर थोड़ा डर गया और पीछे हटने लगा।
रोहित ने बड़ी ही आत्मीयता से मुस्कुराते हुए कहा, “डरो मत दोस्त! मेरा नाम रोहित है। क्या तुम मेरे साथ दिवाली मनाओगे?”
यह सुनकर राजू की आँखों में अचरज और खुशी के मिले-जुले भाव तैर गए। रोहित ने मिठाई और पटाखों से सजी थाली उसकी तरफ बढ़ा दी। राजू ने काँपते हाथों से थाली पकड़ी, उसकी आँखों में खुशी के आँसू छलक आए।
दिलों का मिलन और असली उजाला
रोहित यहीं नहीं रुका। उसने राजू की झोपड़ी के बाहर जाकर उस बुझते हुए दीये को ठीक किया, उसमें और तेल डाला और उसे हवा से बचाने के लिए सुरक्षित स्थान पर रखा। इसके बाद, दोनों दोस्तों ने मिलकर फुलझड़ियाँ जलाईं। जब फुलझड़ी के सुनहरे स्पार्क्स राजू के चेहरे पर चमके, तो उसकी खिलखिलाती हुई मुस्कान ने रोहित के दिल को एक असीम शांति और आनंद से भर दिया।
रोहित के माता-पिता और दादी माँ घर के दरवाजे पर खड़े होकर इस खूबसूरत नज़ारे को देख रहे थे। उनकी आँखों में गर्व के आँसू थे।
जब रोहित वापस अपने घर लौटा, तो दादी माँ ने उसे गले से लगा लिया और कहा, “आज तुमने सच में धर्म के मर्म को समझा है, रोहित। यही भगवान राम की असली सीख है। तुमने आज एक बुझते हुए दीये को ही नहीं बचाया, बल्कि एक मासूम के दिल में उम्मीद का दीया जलाया है।”
रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, “दादी माँ, आज मुझे समझ आया कि पटाखों के शोर से कहीं ज्यादा सुकून और खुशी किसी जरूरतमंद के चेहरे की मुस्कान देखने में है। यह मेरी ज़िंदगी की सबसे बेहतरीन दिवाली है!”
इस प्रकार, उस पावन रात को केवल मिट्टी के दीये ही नहीं जले, बल्कि एक नन्हे बच्चे के मन में करुणा, सहानुभूति और मानवता का एक ऐसा अखंड दीपक जला, जो जीवनभर उसके मार्ग को आलोकित करने वाला था।
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