एक डिलीवरी बॉय की आपबीती (Ek Delivery Boy Ki Aapbiti)

डिलीवरी बॉय राहुल की ज़िंदगी की वह सबसे खौफनाक रात जिसने उसकी रूह कंपा दी। पढ़िए यह रोंगटे खड़े कर देने वाली डार्क स्टोरी।

Ek Delivery Boy Ki Aapbiti

रात के लगभग दो बज रहे थे। घने काले बादल आसमान में छाए हुए थे और रुक-रुक कर रिमझिम बारिश हो रही थी। दिल्ली की इस सर्द रात में, जहाँ लोग अपने घरों में रजाई के अंदर दुबके हुए थे, राहुल अपनी खटारा बाइक पर सवार होकर सुनसान सड़कों पर दौड़ रहा था। राहुल एक फूड डिलीवरी बॉय था। पेट की भूख और परिवार की ज़िम्मेदारियों का बोझ उसे इस ठिठुरती रात में भी चैन से बैठने नहीं दे रहा था। उसके मोबाइल की स्क्रीन अचानक चमकी और एक नया ऑर्डर फ्लैश हुआ।

रहस्यमयी ऑर्डर और सुनसान रास्ता

ऑर्डर शहर के बाहरी इलाके में स्थित ‘सनशाइन अपार्टमेंट’ से था। नाम भले ही ‘सनशाइन’ था, लेकिन उस इलाके में रात के वक्त सिर्फ गहरा अंधेरा और सन्नाटा पसरा रहता था। राहुल ने अपनी बाइक स्टार्ट की और उस ओर चल पड़ा। जैसे-जैसे वह गंतव्य के करीब पहुंच रहा था, सड़क पर गाड़ियों का आना-जाना पूरी तरह बंद हो चुका था। सड़क के दोनों ओर लगे स्ट्रीटलाइट्स या तो बंद थे या फिर अजीब तरीके से टिमटिमा रहे थे, जिससे माहौल और भी डरावना लग रहा था।

करीब बीस मिनट की मशक्कत के बाद राहुल उस अपार्टमेंट के मुख्य गेट के सामने पहुंचा। गेट खुला हुआ था, लेकिन वहां कोई गार्ड तैनात नहीं था। चारों तरफ एक अजीब सी खामोशी थी। केवल हवा के चलने से सूखी पत्तियों की सरसराहट सुनाई दे रही थी। राहुल ने बिल्डिंग के अंदर प्रवेश किया। उसे चौथी मंजिल के फ्लैट नंबर 403 में डिलीवरी देनी थी। लिफ्ट के पास जाकर उसने बटन दबाया, लेकिन लिफ्ट खराब थी। काफी थक जाने के बावजूद उसने सीढ़ियों से ही ऊपर जाने का फैसला किया।

सन्नाटे का अहसास और सीढ़ियों का सफर

सीढ़ियों पर पूरी तरह अंधेरा छाया हुआ था। राहुल ने अपने फोन की फ्लैशलाइट जलाई। हर कदम के साथ उसकी खुद की परछाई दीवार पर किसी डरावने साये की तरह डोल रही थी। जैसे ही उसने तीसरी मंजिल पार की, उसे हवा में एक अजीब सी सड़न महसूस हुई—जैसे कोई पुरानी सड़ी हुई चीज या जमा हुआ खून। उसने अपनी नाक पर रुमाल रख लिया और भारी कदमों से चौथी मंजिल की ओर बढ़ा।

आखिरकार वह फ्लैट नंबर 403 के दरवाजे के सामने खड़ा था। दरवाजा पहले से ही आधा खुला हुआ था, और अंदर पूरी तरह से अंधेरा था। राहुल ने धीरे से दरवाजा खटखटाया, “हेलो, सर! फूड डिलीवरी!”

भीतर से कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर से खटखटाया। इस बार अंदर के सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद धीमी, ठंडी और फुसफुसाती हुई आवाज आई, “अंदर आ जाओ… पैसे सामने टेबल पर रखे हैं…”

फ्लैट नंबर 403 का खौफनाक सच

राहुल के मन में एक अजीब सी घबराहट पैदा हुई, उसके रोंगटे खड़े हो गए। लेकिन अपने काम की मजबूरी के कारण वह धीरे से पैर घसीटते हुए अंदर दाखिल हुआ। कमरे के अंदर का तापमान बाहर की ठंडी हवा से भी कई गुना ज्यादा ठंडा था। ऐसा लग रहा था मानो वह किसी बर्फ की कोठरी में खड़ा हो। टेबल पर एक धूल धूसरित सौ रुपये का नोट और कुछ सिक्के रखे थे। राहुल ने डरते हुए खाने का पैकेट वहां रखा और टेबल से पैसे उठा लिए।

जैसे ही राहुल वापस जाने के लिए मुड़ा, उसकी नजर कमरे के कोने में टंगे एक बड़े और पुराने शीशे पर पड़ी। शीशे में उसने खुद को तो देखा, लेकिन उसके ठीक पीछे खड़ी एक खौफनाक आकृति भी उसे दिखाई दी। वह एक महिला थी, जिसके बाल बिखरे हुए थे, चेहरा आधा झुलसा हुआ था और उसकी आंखें पूरी तरह से काली और खोखली थीं।

राहुल के गले से आवाज तक नहीं निकल पा रही थी। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा, तो वहां कोई नहीं था। लेकिन जैसे ही उसने वापस शीशे में देखा, वह डरावनी आकृति उसके और करीब आ चुकी थी और उसके चेहरे पर एक भयावह मुस्कान थी।

बिना एक पल गंवाए, राहुल ने अपने हाथ से पैसे गिराए और सीढ़ियों की तरफ पागलों की तरह भागा। वह बिना पीछे मुड़े नीचे की ओर दौड़ रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि कोई अदृश्य ताकत उसके ठीक पीछे दौड़ रही है और उसकी बर्फीली सांसें राहुल की गर्दन को छू रही थीं।

एक डरावना अंत

हाँफते हुए राहुल ग्राउंड फ्लोर पर आया और सीधे अपनी बाइक पर बैठकर तेजी से वहां से भाग निकला। अगले दिन, राहुल इस खौफनाक हादसे को भूल नहीं पा रहा था। उसने अपने ऑफिस जाकर अपने मैनेजर और एक सीनियर डिलीवरी बॉय को इस बारे में बताया।

उसकी बात सुनकर सीनियर डिलीवरी बॉय का चेहरा पीला पड़ गया। उसने गहरी सांस ली और कहा, “राहुल, तुम वहां कैसे चले गए? सनशाइन अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 403 में पांच साल पहले एक लड़की की शॉर्ट सर्किट से लगी आग में जलकर मौत हो गई थी। तब से वह पूरी मंजिल सील है और वहां कोई नहीं रहता।”

राहुल ने कांपते हाथों से अपनी जेब में हाथ डाला, तो उसे महसूस हुआ कि जो पैसे उसने टेबल से उठाए थे, वे अब साधारण नोट नहीं बल्कि श्मशान की सूखी राख और जले हुए कागज के टुकड़े बन चुके थे। राहुल के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने उसी दिन वह नौकरी छोड़ दी, लेकिन आज भी जब कोई रात को उसका दरवाजा खटखटाता है, तो उसकी रूह कांप उठती है।


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