
भाभी मैना केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, निश्छल प्रेम और समाज की संकीर्ण रूढ़ियों के बीच पिसती एक मासूम आत्मा की मर्मस्पर्शी दास्तान है। पंजाबी साहित्य के महान लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी द्वारा रचित यह कहानी पाठकों के दिलों को झकझोर कर रख देती है। मैना, जिसे सब प्यार से ‘भाभी मैना’ कहते थे, एक ऐसी लड़की थी जिसके भीतर जीवन की उमंग कूट-कूट कर भरी थी। वह हवा के आज़ाद झोंकों की तरह और बहते झरने की तरह पवित्र थी।
मैना का अल्हड़पन और चुलबुला अंदाज़
मैना का व्यक्तित्व आम लड़कियों से बिल्कुल अलग था। वह इस दुनिया के छल-कपट और बनावटीपन से कोसों दूर थी। उसके लिए पूरी दुनिया एक सुंदर बगीचा थी, जहाँ वह बिना किसी डर के घूमना और चहकना चाहती थी। पेड़ों से बातें करना, चिड़ियों के साथ गाना और बागों में ऊंचे-ऊंचे झूले झूलना उसका पसंदीदा शगल था।
कहानी के सूत्रधार (लेखक) के साथ मैना का रिश्ता बेहद अनूठा और पवित्र था। मैना उम्र में लेखक से बड़ी थी, लेकिन उसका दिल बिल्कुल एक अबोध बच्चे जैसा था। वह लेखक को बड़े स्नेह से ‘बीर’ (भाई) कहकर पुकारती थी। जब भी वह बाग में झूला झूलती, तो उसकी खिलखिलाहट से पूरा वातावरण जीवंत हो उठता था। उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी, जो किसी भी उदास चेहरे पर मुस्कान बिखेरने की ताकत रखती थी। मैना का प्रेम कोई सांसारिक बंधन नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन जैसा था।
समाज की बेड़ियाँ और मैना की खामोशी
लेकिन हमारा समाज अक्सर उस मासूमियत और आज़ादी को बर्दाश्त नहीं कर पाता जो उसकी तय की गई संकुचित सीमाओं से बाहर जाने की कोशिश करती है। मैना की शादी कर दी गई और यहीं से उसके जीवन का दुखांत सफर शुरू हुआ। ससुराल जाते ही उसके जीवन के सारे जीवंत रंग धीरे-धीरे फीके पड़ने लगे।
जिस लड़की की हंसी कभी थमती नहीं थी, वह धीरे-धीरे मौन के गहरे आगोश में समाने लगी। उसके ससुराल वाले और यहाँ तक कि उसका पति भी उसकी इस निश्छल और आज़ाद तबीयत को समझ नहीं पाए। उनके लिए मैना का हर बात पर खिलखिलाना, बच्चों की तरह उछलना-कूदना और प्रकृति से प्रेम करना ‘पागलपन’ या ‘अमर्यादित’ व्यवहार था। समाज की नजरों में एक आदर्श बहू को शांत, गंभीर और घूंघट के पीछे सिमट कर रहना चाहिए था, जो मैना के स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था।
एक टूटते हुए दिल की दास्तान
धीरे-धीरे मैना के पंख काट दिए गए। उसे घर की चारदीवारी के भीतर कैद रहने पर मजबूर किया गया। उसकी आँखों की वह जादुई चमक गायब हो गई और उसकी जगह एक गहरी, मूक उदासी ने ले ली।
सालों बाद जब लेखक उससे दोबारा मिलता है, तो वह मैना को पहचान भी नहीं पाता। वह हंसती-खेलती, चहकती मैना अब केवल हड्डियों का एक ढांचा मात्र रह गई थी। उसके चेहरे का तेज गायब हो चुका था और उसकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन था। वह टीबी (तपेदिक) जैसी जानलेवा बीमारी की चपेट में आ चुकी थी। लेकिन असल में, वह किसी शारीरिक बीमारी से नहीं, बल्कि समाज की संकीर्ण सोच, अपनों की बेरुखी और अकेलेपन के मानसिक दंश से मर रही थी।
एक दर्दनाक अंत और सीख
मैना का अंत बेहद हृदयविदारक था। वह इस नश्वर संसार को छोड़कर चली गई, लेकिन अपनी मासूमियत और निश्छल प्रेम की एक ऐसी अमिट छाप छोड़ गई जिसे वक्त की कोई भी लहर मिटा नहीं सकती।
‘भाभी मैना’ की यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे सामाजिक नियम और मर्यादाएं इतनी कठोर क्यों हैं कि वे किसी मासूम की जान ही ले लें? यह कहानी स्त्री की स्वतंत्रता, उसके मानसिक स्वास्थ्य और समाज के संवेदनहीन रवैये पर एक करारा प्रहार करती है। मैना आज भी हर उस लड़की के रूप में हमारे बीच ज़िंदा है जो अपनी आज़ादी और खुशियों के लिए तड़प रही है।
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