
परिचय: रामदास का सरल जीवन
एक छोटे से गाँव में रामदास नाम का एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बहुत ही सुंदर, मजबूत और कलात्मक बर्तन बनाता था। रामदास बहुत अमीर तो नहीं था, लेकिन अपनी मेहनत की कमाई से वह और उसका परिवार सम्मानजनक जीवन जी रहे थे। उसके बनाए घड़े, दीये और खिलौने दूर-दूर के गाँवों में प्रसिद्ध थे। रामदास का एक ही वसूल था—ईमानदारी और स्वाभिमान। वह कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता था और न ही अपनी कला से समझौता करता था।
धनिक सेठ का लालच और प्रस्ताव
उसी गाँव में सेठ धनीराम रहता था, जो बहुत अमीर और लालची व्यापारी था। धनीराम की नज़र हमेशा अधिक से अधिक मुनाफा कमाने पर रहती थी। उसने देखा कि रामदास के मिट्टी के बर्तनों की मांग बहुत अधिक है। एक दिन वह रामदास की कुटिया पर आया और बोला, “रामदास, तुम इतनी मेहनत करते हो, फिर भी तुम्हें दो वक्त की सूखी रोटी ही नसीब होती है। मेरे पास तुम्हारे लिए एक बेहतरीन प्रस्ताव है।”
रामदास ने आदरपूर्वक कहा, “कहिए सेठ जी, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”
धनीराम ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम जो बर्तन बनाते हो, उसमें बहुत समय और अच्छी मिट्टी लगाते हो। मैं चाहता हूँ कि तुम मिट्टी में मिलावट करो और जल्दबाजी में सस्ते बर्तन बनाओ। मैं उन्हें अपने ब्रांड के नाम पर शहर के रईसों को ऊंचे दामों पर बेचूँगा। मुनाफा आधा-आधा होगा। तुम रातों-रात अमीर बन जाओगे।”
स्वाभिमान की परीक्षा
रामदास ने कुछ पल सोचा। सेठ का प्रस्ताव उसे बहुत सारा पैसा दे सकता था, लेकिन इसके लिए उसे अपने ग्राहकों को धोखा देना पड़ता और अपनी कला की गरिमा को गिराना पड़ता।
रामदास ने विनम्रता लेकिन दृढ़ता से उत्तर दिया, “सेठ जी, आपका धन्यवाद। लेकिन मैं अपनी कला और अपनी मिट्टी से गद्दारी नहीं कर सकता। घटिया सामान बेचकर लोगों का विश्वास तोड़ना मेरे स्वाभिमान के खिलाफ है। मुझे रूखी-सूखी रोटी ही मंजूर है, लेकिन धोखे की मलाई नहीं।”
यह सुनकर सेठ धनीराम गुस्से से लाल-पीला हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, “रामदास, तुम अपनी औकात भूल रहे हो। इस गाँव में मेरे खिलाफ जाने की हिम्मत किसी की नहीं है। अगर तुमने मेरा प्रस्ताव नहीं माना, तो मैं तुम्हारा धंधा चौपट कर दूँगा।”
रामदास ने शांत रहकर कहा, “सेठ जी, आप मेरा धंधा छीन सकते हैं, लेकिन मेरा स्वाभिमान नहीं।”
संघर्ष और सच्चाई की जीत
सेठ धनीराम ने रामदास को बर्बाद करने की ठान ली। उसने शहर से सस्ते और चमकदार चीनी मिट्टी के बर्तन मंगवाकर गाँव के बाज़ार में रखवा दिए और रामदास के बर्तनों का बहिष्कार करने के लिए लोगों को उकसाया। कुछ दिनों तक रामदास के बर्तन नहीं बिके। उसका परिवार संकट में आ गया, लेकिन रामदास विचलित नहीं हुआ। वह रोज़ सुबह उठता, भगवान का नाम लेता और पूरी लगन से मिट्टी के बर्तन बनाता।
तभी एक दिन, राज्य के राजा के मंत्री उस गाँव से गुजरे। गर्मी का मौसम था और उन्हें प्यास लगी थी। उन्होंने सेठ धनीराम के यहाँ पानी माँगा। धनीराम ने उन्हें कांच के गिलास में पानी दिया, लेकिन पानी गर्म था। तभी मंत्री की नज़र रामदास की कुटिया के बाहर रखे मिट्टी के घड़े पर पड़ी। उन्होंने रामदास के घड़े का शीतल जल पिया। जल पीकर मंत्री तृप्त हो गए।
मंत्री ने घड़े की बनावट और पानी की शीतलता की बहुत तारीफ की। उन्होंने रामदास से पूछा, “इस अद्भुत घड़े की कीमत क्या है?”
रामदास ने कहा, “हुजूर, इसकी कीमत सिर्फ मेहनत और ईमानदारी है।”
मंत्री रामदास की कला और उसके विचारों से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने तुरंत राजमहल के लिए सैकड़ों मिट्टी के बर्तनों का ऑर्डर दे दिया और रामदास को राजदरबार का मुख्य कुम्हार घोषित कर दिया।
सीख
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें अपने स्वाभिमान (Self-respect) और ईमानदारी से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। पैसा आता-जाता रहता है, लेकिन एक बार खोया हुआ आत्मसम्मान कभी वापस नहीं मिलता। स्वाभिमान ही इंसान की असली पूँजी है।
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