
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से बेहद सुंदर और शांत शहर में रोहन नाम का एक लड़का रहता था। वह पढ़ने-लिखने में बहुत ही होनहार, बुद्धिमान और कुशाग्र बुद्धि का छात्र था। स्कूल के शिक्षक भी उसकी प्रतिभा की तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन इस चमकते हुए सितारे के भीतर एक बहुत बड़ी कमी थी—वह बेहद आलसी था और अपने हर काम को “कल” पर टालने की बुरी आदत से ग्रसित था। उसके इस लापरवाह स्वभाव से उसके माता-पिता हमेशा बहुत चिंतित रहते थे।
रोहन की आदत और कल पर टालने का स्वभाव
रोहन का मानना था कि समय बहुत है और जो काम आज करना है, उसे कल भी तो किया जा सकता है। जब भी उसकी माँ उसे समय पर पढ़ाई करने या गृहकार्य (Homework) पूरा करने के लिए कहतीं, तो उसका एक ही रटा-रटाया जवाब होता था, “माँ, अभी तो बहुत समय बचा है, मैं इसे बाद में या कल आराम से कर लूँगा। आखिर इतनी जल्दी क्या है!”
उसके पिता रमेश जी एक बहुत ही समझदार व्यक्ति थे। वे उसे अक्सर प्यार से समझाते थे, “बेटा रोहन, समय किसी का इंतजार नहीं करता। जो समय आज रेत की तरह हाथ से फिसल गया, वह फिर कभी लौटकर नहीं आएगा। समय की कीमत को समझो, वरना एक दिन तुम्हें इसके लिए बहुत पछताना पड़ेगा।” लेकिन रोहन अपने पिता की इन अनमोल बातों को एक कान से सुनता और दूसरे कान से निकाल देता। उसके लिए समय का कोई विशेष मूल्य नहीं था।
पिता की चिंता और बड़ी प्रतियोगिता का अवसर
एक दिन रोहन के स्कूल में एक घोषणा की गई। वहाँ एक जिला स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी (Science Exhibition) का आयोजन होने जा रहा था। इसमें प्रथम पुरस्कार जीतने वाले छात्र को न केवल राज्य स्तर पर जाने का सुनहरा मौका मिलने वाला था, बल्कि एक शानदार मुख्य नकद पुरस्कार भी दिया जाना था। रोहन विज्ञान विषय में बहुत रुचि रखता था और उसके पास एक बेहतरीन, अनोखा रोबोटिक मॉडल बनाने का एक बहुत बड़ा विचार (Idea) भी था।
प्रतियोगिता की तैयारी के लिए सभी छात्रों को पूरे पंद्रह दिन का समय दिया गया था। जब रोहन ने यह सुना, तो उसने मन ही मन सोचा, “पंद्रह दिन! यह तो बहुत लंबा समय है। मैं तो इसे आखिरी दो-तीन दिनों में ही चुटकियों में बना लूँगा। अभी से इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत है।” जहाँ उसके दोस्तों ने उसी दिन से अपनी योजना बनाकर सामग्री जुटाना और तैयारी करना शुरू कर दिया था, वहीं रोहन बेफिक्र होकर खेलता-कूदता और घूमता रहा।
‘कल करेंगे’ की भूल और आखिरी दिन की छटपटाहट
धीरे-धीरे दिन बीतते गए। देखते ही देखते बारह दिन निकल चुके थे, लेकिन रोहन ने अपने प्रोजेक्ट को हाथ भी नहीं लगाया था। जब भी उसके पिता पूछते, तो वह बड़ी सहजता से कहता, “पापा, आप चिंता मत कीजिए, सब तैयारी मेरे दिमाग में फिट है। बस कल्पपुर्जे जोड़ने हैं, यह तो सिर्फ एक दिन का काम है।”
आखिरकार, प्रतियोगिता की आखिरी रात आ गई। अगले ही दिन सुबह प्रोजेक्ट जमा करना था। रोहन ने अपनी मेज पर सारा सामान फैलाया और मॉडल बनाना शुरू किया। जैसे ही उसने काम शुरू किया, उसे अचानक एहसास हुआ कि जो सबसे मुख्य इलेक्ट्रॉनिक चिप उसे अपने रोबोटिक मॉडल में लगानी थी, वह तो बाजार से लाना ही भूल गया था। बिना उस चिप के उसका मॉडल सिर्फ कबाड़ का एक डिब्बा बनकर रह जाता।
वह घबराकर तुरंत बाजार की तरफ भागा। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। रात के नौ बज चुके थे और सर्दियों की रात होने के कारण शहर की सभी इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानें बंद हो चुकी थीं। रोहन ने कई दुकानदारों के घरों के चक्कर लगाए, लेकिन उसे वह चिप नहीं मिली।
वह खाली हाथ, हताश और रोते हुए घर लौटा। उसने पूरी रात जागकर कोशिश की कि किसी तरह वह उस मुख्य चिप के बिना ही मॉडल को पूरा कर ले, लेकिन विज्ञान तो नियमों से चलता है, किसी के आलस्य से नहीं। उसका मॉडल काम नहीं कर पाया।
खोया हुआ अवसर और जीवन की सबसे बड़ी सीख
अगले दिन स्कूल की प्रदर्शनी में सभी छात्रों ने एक से बढ़कर एक शानदार मॉडल प्रस्तुत किए। रोहन के कुछ ऐसे सहपाठी, जो पढ़ाई में उससे बहुत सामान्य थे, उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और समय के सही प्रबंधन (Time Management) के बल पर अद्भुत मॉडल तैयार किए थे। रोहन बिना किसी प्रोजेक्ट के, सिर झुकाए चुपचाप एक कोने में खड़ा रहा। उसके शिक्षक और दोस्त हैरान थे कि इतना होनहार और प्रतिभाशाली लड़का आज खाली हाथ खड़ा था।
प्रथम पुरस्कार रोहन के ही एक सहपाठी को मिला, जिसने समय का सही उपयोग किया था। रोहन को अपनी गलती का बहुत ही गहरा और दर्दनाक एहसास हुआ। वह घर आते ही अपने पिता के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसने सिसकते हुए कहा, “पापा, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। काश मैंने आपकी बात मान ली होती और समय रहते अपना काम शुरू कर दिया होता। आज मुझे अपनी काबिलियत साबित करने का सबसे बड़ा मौका गँवाना पड़ा।”
समय का सदुपयोग ही सफलता की कुंजी है
रमेश जी ने रोहन के आंसू पोंछे और उसे प्यार से सहलाते हुए कहा, “बेटा, रोने से अब कुछ नहीं होगा। लेकिन मुझे खुशी है कि आज तुम्हें समय ने स्वयं अपनी कीमत सिखा दी है। याद रखो, धन यदि खो जाए तो कड़ी मेहनत से दोबारा कमाया जा सकता है, स्वास्थ्य खराब हो तो दवाओं से ठीक हो सकता है, लेकिन जो समय एक बार घड़ी की सुइयों के साथ आगे निकल गया, उसे दुनिया की कोई भी संपत्ति या ताकत वापस नहीं ला सकती। सफल और असफल व्यक्ति में केवल यही एक अंतर होता है कि सफल व्यक्ति समय की कद्र करता है और असफल व्यक्ति उसे कल पर टालकर बर्बाद करता है।”
रोहन ने उस दिन अपने पिता से और खुद से यह प्रतिज्ञा की कि वह जीवन में कभी भी किसी भी काम को कल पर नहीं टालेगा। उस दिन के बाद से रोहन पूरी तरह बदल गया। वह अपने सभी काम समय सारिणी (Time Table) बनाकर अनुशासन के साथ करने लगा। परिणाम स्वरूप, आगे चलकर उसने न केवल पढ़ाई में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में बड़ी और ऐतिहासिक सफलताएं हासिल कीं।
निष्कर्ष (Moral of the Story)
इस कहानी से हमें यह अत्यंत महत्वपूर्ण सीख मिलती है कि समय ही इस संसार का सबसे मूल्यवान धन है। बीता हुआ एक-एक सेकंड हमारे जीवन की अनमोल पूंजी है जिसे हम दोबारा कभी खरीद नहीं सकते। आलस्य हमारा सबसे बड़ा शत्रु है जो हमें समय की कद्र करने से रोकता है। यदि हम आज समय का सम्मान करेंगे, तो आने वाला कल हमारा और हमारे सपनों का सम्मान करेगा।
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