Pranay-Nivedita: एक अधूरी दास्तान की मुकम्मल मोहब्बत

पढ़िए 'प्रणय-निवेदिता' की एक बेहद खूबसूरत और भावुक कर देने वाली रोमांटिक कहानी। शिमला की हसीन वादियों में पनपी एक अनोखी प्रेम दास्तान।

Pranay Nivedita

शिमला की वादियों में जब भी मानसून दस्तक देता था, तो यहाँ की फिजाओं में एक अजीब सी खामोशी और सुघड़ता तैरने लगती थी। देवदार के पेड़ों से छनकर आती धुंध और मिट्टी की सोंधी महक किसी को भी शायर बनाने के लिए काफी थी। इसी खूबसूरत शहर के एक पुराने, औपनिवेशिक काल के पुस्तकालय (Library) में यह कहानी आकार ले रही थी। यह कहानी थी ‘प्रणय’ और ‘निवेदिता’ की, जिनके नाम जितने खूबसूरत थे, उनकी तकदीर की राहें भी उतनी ही दिलचस्प थीं।

शिमला की वो हसीन शाम और दो अजनबी

निवेदिता एक स्वतंत्र लेखिका थी। उसे पुरानी किताबों की खुशबू, हाथ में चाय का कुल्हड़ और खिड़की से बाहर गिरती बारिश की बूंदें बेहद पसंद थीं। वह हर रोज पुस्तकालय के एक कोने वाली मेज पर बैठती और अपनी डायरी में कुछ न कुछ लिखती रहती।

दूसरी तरफ, प्रणय एक आर्किटेक्ट था, जो शहर की भागदौड़ से दूर शिमला में शांति की तलाश में आया था। उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव था और उसके हाथों में हमेशा एक स्केचबुक रहती थी। वह अक्सर निवेदिता से दो मेज छोड़कर बैठता था। दोनों रोज़ मिलते थे, एक-दूसरे को देखते थे, लेकिन उनके बीच कभी कोई बात नहीं हुई थी। दोनों के बीच केवल एक अनकहा, अनसुना रिश्ता था, जिसे शब्दों की जरूरत नहीं थी।

खामोशियाँ जो बहुत कुछ कहती थीं

हफ़्तों बीत गए। दोनों की खामोश मुलाकातें जारी रहीं। निवेदिता जब अपनी डायरी में खोई होती, तब प्रणय चुपके से अपनी पेंसिल उठाता और कागज़ पर निवेदिता के चेहरे के हाव-भाव को उतारने लगता। कभी उसकी झुकी हुई पलकें, तो कभी चाय पीते समय उसके होठों पर आने वाली हल्की सी मुस्कान। प्रणय के स्केचबुक के हर पन्ने पर निवेदिता जीवंत हो उठती थी।

निवेदिता भी इस बात से अनजान नहीं थी। वह महसूस कर सकती थी कि कोई उसकी रूह को अपने कैनवास पर उतार रहा है। जब भी उनकी नजरें मिलतीं, दोनों एक सौम्य मुस्कान का आदान-प्रदान करते और फिर अपनी-अपनी दुनिया में खो जाते। यह खामोशी इतनी गहरी थी कि इसमें दुनिया का सारा शोर गायब हो जाता था।

स्केचबुक का वो राज़

एक शाम, बारिश बहुत तेज थी। पुस्तकालय बंद होने का समय हो चुका था। प्रणय किसी काम की जल्दी में अपनी स्केचबुक वहीं टेबल पर भूलकर चला गया। निवेदिता ने जब टेबल पर अकेली पड़ी उस स्केचबुक को देखा, तो उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने झिझकते हुए उसे उठाया और उसके पन्ने पलटने लगी।

पहले पन्ने पर उसकी एक तस्वीर थी, जिसके नीचे लिखा था—’मौन की भाषा’। अगले पन्ने पर खिड़की से बाहर देखती निवेदिता थी, जिसके नीचे लिखा था—’बारिश और वह’। जैसे-जैसे पन्ने पलटते गए, निवेदिता की आँखों में आँसू तैरने लगे। हर स्केच के साथ प्रणय ने अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोया था। अंतिम पन्ने पर एक अधूरी पेंटिंग थी, जिसमें एक लड़का और लड़की हाथ पकड़े खड़े थे, लेकिन लड़की का चेहरा अभी साफ नहीं था। वहाँ लिखा था—”क्या तुम इस अधूरी तस्वीर को पूरा करोगी?”

प्रणय का निवेदन: जब शब्द कम पड़ गए

अगले दिन प्रणय पुस्तकालय नहीं आया। निवेदिता बेचैन हो उठी। पूरा दिन बीत गया, लेकिन वह नहीं दिखा। निवेदिता को महसूस हुआ कि जिस शख्स से उसने कभी बात भी नहीं की थी, वह उसके वजूद का एक अहम हिस्सा बन चुका था।

तभी पुस्तकालय के केयरटेकर ने निवेदिता को एक लिफाफा सौंपा। केयरटेकर ने कहा, “वह नौजवान आज सुबह की ट्रेन से हमेशा के लिए दिल्ली लौट गया। वह आपके लिए यह दे गया है।”

निवेदिता ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। उसमें एक पत्र था और साथ में वही अधूरी पेंटिंग थी, जो अब पूरी हो चुकी थी। उस पेंटिंग में निवेदिता का चेहरा साफ दिख रहा था। पत्र में लिखा था:

“प्रिय निवेदिता,
शायद मैं कभी शब्दों में तुमसे यह न कह पाता। मेरी खामोशी ही मेरा प्यार थी। लेकिन आज जब मैं जा रहा हूँ, तो अपना दिल तुम्हारे पास छोड़ रहा हूँ। यह मेरा ‘प्रणय-निवेदिता’ (प्रेम का निवेदन) है। अगर तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए वही धड़कन है, तो मुझे रोक लेना… मैं शिमला के रेलवे स्टेशन पर तुम्हारा इंतजार करूँगा।”

दिल की मंज़िल

पत्र पढ़ते ही निवेदिता के पैर थम नहीं सके। उसने अपनी डायरी उठाई और बाहर बरसती बारिश में दौड़ पड़ी। ठंडी हवाएँ उसके चेहरे से टकरा रही थीं, लेकिन उसके दिल में एक अजीब सी गर्मी थी।

जब वह हाफती हुई शिमला रेलवे स्टेशन पहुंची, तो ट्रेन चलने ही वाली थी। उसने चारों तरफ देखा। भीड़ में उसे प्रणय का उदास चेहरा दिखाई दिया, जो खिड़की के पास बैठा शून्य में ताक रहा था।

“प्रणय!” निवेदिता ने अपनी पूरी ताकत से चिल्लाया।

उसकी आवाज सुनकर प्रणय ने खिड़की से बाहर देखा। निवेदिता को भीगा हुआ और हांफते हुए देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई। वह तुरंत अपना बैग लेकर ट्रेन से नीचे उतर गया।

दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। बारिश की बूंदें उनके चेहरों को छू रही थीं। निवेदिता ने अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर प्रणय के हाथ में थमा दिया। उस पर लिखा था:

“मेरी हर कहानी का शीर्षक सिर्फ तुम हो। इस प्रणय को निवेदीता स्वीकार करती है।”

प्रणय ने मुस्कुराते हुए निवेदिता का हाथ थाम लिया। शिमला की वादियों ने एक और मुकम्मल मोहब्बत की दास्तान को अपने सीने में हमेशा के लिए दफन कर लिया।


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