
मुगल साम्राज्य के इतिहास में बादशाह अकबर और उनके चतुर मंत्री बीरबल के बीच के किस्से आज भी बड़े चाव से सुने और सुनाए जाते हैं। अकबर के दरबार में रोज नए-नए और पेचीदा सवाल उठते थे, जिनका समाधान केवल बीरबल के पास ही होता था। बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, हाजिरजवाबी और व्यावहारिक ज्ञान के बल पर हर मुश्किल को आसान बना देते थे। ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प और सीख देने वाली कहानी है – “अंधे और आंख वाले”।
दरबार में उठा एक अजीब सवाल
बात उन दिनों की है जब राजधानी में शांति और समृद्धि का माहौल था। एक दिन बादशाह अकबर अपनी राजसभा में मंत्रियों के साथ गंभीर विचार-विमर्श कर रहे थे। चर्चा समाप्त होने के बाद, अकबर के मन में एक अनोखा और कौतूहल से भरा विचार आया। उन्होंने दरबारियों की तरफ देखा और अचानक एक सवाल दागा।
अकबर ने पूछा, “सभासदों, क्या आप में से कोई मुझे बता सकता है कि हमारे राज्य में अंधों की संख्या अधिक है या फिर उन लोगों की जिनके पास आंखें हैं और वे सब कुछ देख सकते हैं?”
बादशाह का यह अजीबोगरीब सवाल सुनकर सभी दरबारी एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। किसी के पास इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं था। कुछ मंत्रियों ने अनुमान लगाते हुए कहा कि निश्चित रूप से आंख वाले लोगों की संख्या अधिक होगी, क्योंकि अंधे लोग तो बहुत कम दिखाई देते हैं।
तभी बीरबल हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए आगे आए और बोले, “जहाँपनाह! आपके इस सवाल का जवाब बहुत सीधा है। मेरे अनुमान और समझ के अनुसार, इस राज्य में आँखों वालों की तुलना में अंधों की संख्या बहुत अधिक है।”
बीरबल की खुली चुनौती
बीरबल की बात सुनकर बादशाह अकबर हैरान रह गए। उन्होंने कहा, “बीरबल, यह तुम क्या कह रहे हो? हमारे राज्य में चारों तरफ लोग काम कर रहे हैं, घूम रहे हैं, देख रहे हैं। फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि यहाँ अंधों की संख्या अधिक है? क्या तुम्हारे पास अपनी इस बात को साबित करने का कोई सबूत है?”
बीरबल ने पूरे आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया, “जहाँपनाह, मैं न केवल अपनी बात को सच साबित कर सकता हूँ, बल्कि आने वाले कुछ ही दिनों में आपको इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी दे दूँगा। बस मुझे इसके लिए थोड़े समय और कुछ संसाधनों की आवश्यकता होगी।”
अकबर ने तुरंत बीरबल की चुनौती स्वीकार कर ली और उन्हें अपनी बात सिद्ध करने की पूरी अनुमति दे दी।
बाजार में बीरबल का अनोखा प्रयोग
अपनी बात को साबित करने के लिए बीरबल ने एक अनूठी योजना बनाई। अगले दिन सुबह-सुबह, बीरबल साम्राज्य के सबसे व्यस्त और बड़े बाजार के बीचों-बीच जाकर बैठ गए। उनके पास खाट (चारपाई) बुनने का सारा सामान जैसे बांस की लकड़ी, रस्सी और औजार मौजूद थे। बीरबल ने बड़ी गंभीरता के साथ बाजार के मुख्य चौराहे पर खाट बुनना शुरू कर दिया।
बीरबल के साथ उनका एक सेवक भी बैठा था, जिसके हाथ में एक लंबी कागज की शीट और कलम-दवात थी। बीरबल ने सेवक को सख्त निर्देश दिए थे कि वह केवल वही लिखेगा जो बीरबल उसे लिखने के लिए कहेंगे।
चूंकि बीरबल बादशाह के मुख्य सलाहकार और राज्य के सबसे सम्मानित व्यक्तियों में से एक थे, उन्हें इस तरह सड़क पर बैठकर खाट बुनते देखना लोगों के लिए बेहद आश्चर्यजनक था। बाजार से गुजरने वाले हर व्यक्ति की नजर उन पर पड़ रही थी।
‘अंधों’ की सूची बनने की शुरुआत
कुछ ही देर में वहाँ लोगों की भीड़ जुटने लगी। सबसे पहले एक राहगीर बीरबल के पास आया और उत्सुकता से पूछा, “बीरबल जी, आप यह क्या कर रहे हैं?”
बीरबल ने उस व्यक्ति की तरफ देखा, मुस्कुराए और अपने सेवक से कहा, “इस व्यक्ति का नाम अंधों की सूची में लिख लो।”
सेवक ने तुरंत उस व्यक्ति का नाम सूची में दर्ज कर लिया। वह राहगीर हैरान रह गया और बिना कुछ समझे आगे बढ़ गया।
इसके बाद एक व्यापारी वहाँ से गुजरा। उसने भी बीरबल को खाट बुनते देखा और अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाया। उसने पूछा, “अरे बीरबल भाई! आप यहाँ बैठकर क्या कर रहे हैं? क्या आप खाट बुन रहे हैं?”
बीरबल ने सेवक की तरफ इशारा किया, “इसका नाम भी अंधों की सूची में डाल दो।”
जैसे-जैसे दिन ढलता गया, सैकड़ों लोग बीरबल के पास आते गए। हर कोई अपनी आँखों से देख रहा था कि बीरबल खाट बुनने का काम कर रहे हैं, लेकिन फिर भी वे अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए वही सवाल पूछते थे – “बीरबल जी, आप क्या कर रहे हैं?” बीरबल लगातार उन सभी के नाम ‘अंधों’ की सूची में लिखवाते जा रहे थे। इस बीच कुछ लोग ऐसे भी आए जिन्होंने बिना कोई सवाल किए केवल बीरबल के काम को देखा और आगे बढ़ गए, उनके नाम बीरबल ने ‘आँखों वाले’ लोगों की सूची में दर्ज करवाए।
जब खुद बादशाह अकबर वहाँ पहुँचे
शाम होते-होते यह खबर महल तक पहुँच गई कि बीरबल ने बीच बाजार में खाट बुनने की दुकान लगा रखी है और वे वहाँ आने-जाने वालों के नाम किसी गुप्त सूची में लिख रहे हैं। बादशाह अकबर की उत्सुकता भी बढ़ गई। वे अपने अंगरक्षकों के साथ सीधे उस बाजार में पहुँचे जहाँ बीरबल काम कर रहे थे।
अकबर ने देखा कि बीरबल पूरी तन्मयता के साथ खाट बुनने में व्यस्त हैं। अकबर भी अपनी उत्सुकता पर काबू नहीं रख पाए और उन्होंने तुरंत पूछा, “बीरबल! तुम यहाँ बीच बाजार में बैठकर यह क्या कर रहे हो?”
बीरबल ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपने सेवक की ओर देखा और कहा, “सेवक, हमारी इस सूची में जहाँपनाह बादशाह अकबर का नाम भी सबसे ऊपर लिख लो।”
यह सुनकर अकबर चौंक गए और क्रोधित होते हुए बोले, “बीरबल! यह क्या गुस्ताखी है? तुमने मेरा नाम अंधों की सूची में क्यों लिखवाया? क्या तुम्हें मेरी आँखें दिखाई नहीं देतीं?”
बीरबल का चतुराई भरा स्पष्टीकरण
बीरबल बड़ी विनम्रता से खड़े हुए, अपने हाथ जोड़े और बोले, “जहाँपनाह, गुस्ताखी माफ हो। लेकिन जरा सोचिए, आप अपनी आँखों से साफ-साफ देख रहे हैं कि मैं यहाँ बैठकर खाट बुन रहा हूँ। आपके सामने बांस की लकड़ियाँ और रस्सियाँ पड़ी हैं। इसके बावजूद आपने मुझसे पूछा कि ‘बीरबल तुम क्या कर रहे हो?'”
बीरबल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “महाराज, जो व्यक्ति अपनी आँखों के सामने हो रही स्पष्ट घटना या काम को देखकर भी उसके बारे में सवाल पूछे, क्या उसे वास्तव में देखने वाला कहा जा सकता है? वह तो आँखें होते हुए भी अंधे के समान ही व्यवहार कर रहा है। इसी तर्क के आधार पर मैंने आपका और बाजार के इन तमाम लोगों का नाम अंधों की सूची में लिखा है।”
बीरबल का यह तार्किक और बुद्धिमानी से भरा जवाब सुनकर अकबर निरुत्तर हो गए। वे समझ गए कि बीरबल ने किस चतुराई से अपनी बात को सच साबित कर दिखाया है। अकबर अपनी हँसी नहीं रोक पाए और उन्होंने बीरबल की इस हाजिरजवाबी की जमकर तारीफ की। उन्हें बहुमूल्य उपहारों से सम्मानित किया गया।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
इस प्रसिद्ध कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि केवल शारीरिक रूप से आँखें होना ही पर्याप्त नहीं है। सच्चा देखना और समझना वह है जब हम अपनी बुद्धि, सजगता और सामान्य ज्ञान (Common Sense) का सही समय पर सही उपयोग करें। जो लोग स्पष्ट चीजों को देखकर भी अनदेखा करते हैं या उन पर बिना सोचे-विचारे सवाल करते हैं, वे आँखें होते हुए भी अज्ञानी ही बने रहते हैं।
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