
मुग़ल सल्तनत के बादशाह अकबर के दरबार में आए दिन अजीबोगरीब मामले आते रहते थे। लेकिन जब भी कोई मामला पेचीदा होता, तो सबकी नज़रें बीरबल पर टिक जाती थीं। बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और हाजिरजवाबी के लिए न केवल दिल्ली में बल्कि पूरे देश में प्रसिद्ध थे। ऐसी ही एक दिलचस्प घटना तब घटी, जब दो पड़ोसी एक आम के पेड़ के मालिकाना हक को लेकर आपस में भिड़ गए और मामला शहंशाह के दरबार में पहुँचा।
विवाद की शुरुआत
एक समय की बात है, एक समृद्ध गाँव में दो पड़ोसी रहते थे – रामलाल और श्यामलाल। दोनों के घरों की सीमा के ठीक बीचों-बीच एक विशाल और हरा-भरा आम का पेड़ था। उस साल पेड़ पर बहुत ही मीठे और रसीले आम आए थे। रामलाल का दावा था कि यह पेड़ उसने लगाया था और सालों तक इसकी देखभाल की थी, इसलिए इस पर केवल उसका हक है। दूसरी तरफ, श्यामलाल का कहना था कि पेड़ की जड़ें और शाखाएं उसके हिस्से की ज़मीन पर ज़्यादा फैली हुई हैं, और उसने भी इस पेड़ को सींचा है, इसलिए यह उसका है।
दोनों के बीच का विवाद इतना बढ़ गया कि बात गाली-गलौज और मारपीट तक पहुँच गई। गाँव के पंचायत ने सुलह कराने की कोशिश की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। आखिरकार, दोनों न्याय की गुहार लेकर बादशाह अकबर के दरबार में पहुँचे।
बीरबल की अनोखी अदालत
बादशाह अकबर ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। रामलाल ने रोते हुए कहा, “जहाँपनाह, यह पेड़ मेरे दादाजी के समय का है। मैंने इसे अपने बच्चों की तरह पाला है। अब जब इस पर फल आए हैं, तो श्यामलाल इस पर कब्ज़ा करना चाहता है।”
वहीं श्यामलाल ने प्रतिवाद करते हुए कहा, “शहंशाह, यह सरासर झूठ है! यह पेड़ मेरी सीमा में है और इसकी छाँव में मेरा पूरा परिवार बैठता है। रामलाल लालच में आकर इसे अपना बता रहा है।”
बादशाह अकबर असमंजस में पड़ गए। बिना किसी ठोस सबूत या गवाह के यह तय करना नामुमकिन था कि पेड़ का असली मालिक कौन है। हमेशा की तरह, अकबर ने इस गुत्थी को सुलझाने का काम बीरबल को सौंप दिया।
न्याय का अनोखा फैसला
बीरबल ने दोनों को ध्यान से देखा और कुछ देर सोचने के बाद कहा, “जहाँपनाह, इस मामले में कोई गवाह नहीं है, इसलिए सच्चाई का पता लगाना मुश्किल है। क्यों न हम इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म कर दें?”
अकबर ने पूछा, “वह कैसे बीरबल?”
बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “चूँकि दोनों ही इस पेड़ पर अपना बराबर का हक जता रहे हैं, इसलिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि इस आम के पेड़ को कुल्हाड़ी से ठीक बीच से काट दिया जाए। आधा हिस्सा रामलाल को दे दिया जाए और आधा श्यामलाल को। पेड़ पर लगे आमों को भी आधा-आधा बाँट लिया जाए। इस तरह दोनों को बराबर का हक मिल जाएगा।”
यह सुनते ही श्यामलाल तुरंत खुश हो गया और बोला, “बीरबल साहब! आपका न्याय वाकई लाजवाब है। मैं इस फैसले से पूरी तरह सहमत हूँ। पेड़ को काट दिया जाए ताकि आधा हिस्सा मुझे मिल सके।”
लेकिन रामलाल का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने हाथ जोड़कर बीरबल से विनती की, “नहीं हुज़ूर! दया करें। इस पेड़ को मत काटिए। मैंने इसे सालों तक अपने खून-पसीने से सींचा है। मैं इसे कटते हुए नहीं देख सकता। भले ही आप यह पेड़ पूरी तरह से श्यामलाल को दे दीजिए, लेकिन इसे जीवित रहने दीजिए। कम से कम यह सुरक्षित तो रहेगा।”
असली मालिक की पहचान
रामलाल की यह बात सुनते ही बीरबल के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान आ गई। उन्होंने तुरंत सिपाहियों को आदेश दिया, “श्यामलाल को गिरफ्तार कर लिया जाए!”
दरबार में सन्नाटा छा गया। अकबर ने पूछा, “बीरबल, तुमने ऐसा क्यों किया?”
बीरबल ने सलीके से जवाब दिया, “जहाँपनाह, जो असली माता-पिता या मालिक होता है, वह कभी भी अपनी संतान या अपनी प्रिय वस्तु का विनाश नहीं देख सकता। रामलाल ने इस पेड़ को पाला है, इसलिए वह इसे कटने से बचाने के लिए अपना दावा छोड़ने को तैयार हो गया। इसके विपरीत, श्यामलाल को इस पेड़ से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था, वह केवल मुफ्त के आम और लकड़ी पाना चाहता था। इसलिए उसने पेड़ काटने की बात सहर्ष स्वीकार कर ली।”
बादशाह अकबर बीरबल के इस त्वरित और सटीक न्याय से बेहद प्रसन्न हुए। उन्होंने रामलाल को पेड़ का असली मालिक घोषित किया और श्यामलाल को उसकी धोखाधड़ी और लालच के लिए जेल भेज दिया।
कहानी से सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जो चीज़ हमारी मेहनत और लगन से बनी होती है, उसके प्रति हमारा प्रेम निस्वार्थ होता है। लालची व्यक्ति केवल फल पाना चाहता है, जबकि सच्चा हकदार उस चीज़ के अस्तित्व की रक्षा के लिए अपनी खुशियों का त्याग करने से भी पीछे नहीं हटता। इसके अलावा, सच को कभी छिपाया नहीं जा सकता; वह किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है।
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