Nimantran

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हिंदी साहित्य के अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने जहाँ एक ओर समाज की कुप्रथाओं और गरीबी पर गंभीर कहानियाँ लिखी हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी लेखनी से हास्य और व्यंग्य की ऐसी धारा बहाई है जो पाठकों को लोटपोट कर देती है। उनकी ऐसी ही एक बेहद लोकप्रिय और मजेदार कहानी है—‘निमंत्रण’ (Nimantran)। यह कहानी पंडित मोटेराम शास्त्री के भोजन-प्रेम और उनके लालच को बेहद मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करती है।

पंडित मोटेराम शास्त्री का परिचय

काशी के पंडित मोटेराम शास्त्री अपने ज्ञान के लिए जितने प्रसिद्ध थे, उससे कहीं अधिक वे अपने भोजन-भट्ट स्वभाव के लिए जाने जाते थे। पंडित जी के लिए संसार का सबसे बड़ा सुख था—’मुफ्त का निमंत्रण’। जहाँ कहीं भी यज्ञ, श्राद्ध, ब्रह्मभोज या कोई मांगलिक उत्सव होता, पंडित मोटेराम जी वहाँ सबसे अग्रिम पंक्ति में विराजमान मिलते थे। उनका मानना था कि ईश्वर ने पेट भरने के लिए ही मनुष्य को इस धरती पर भेजा है, और यदि भोजन मुफ्त का हो, तो उसे ग्रहण करने में संकोच कैसा?

पंडित जी की इस जीवन-शैली में उनकी धर्मपत्नी, सोना देवी भी उनका पूरा सहयोग देती थीं। वे दोनों मिलकर हर उस अवसर की तलाश में रहते थे जहाँ स्वादिष्ट पकवानों का स्वाद चखा जा सके।

जब मिला रानी साहिबा का महाभोज का निमंत्रण

एक दिन पंडित मोटेराम शास्त्री के भाग्य जाग उठे। उन्हें नगर की प्रसिद्ध और दानवीर रानी साहिबा के यहाँ से एक विशाल ब्रह्मभोज का निमंत्रण मिला। इस निमंत्रण की विशेषता यह थी कि इसमें काशी के चुनिंदा और श्रेष्ठ विद्वानों को आमंत्रित किया गया था।

जैसे ही यह शुभ समाचार पंडित जी के कानों तक पहुँचा, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी सोना को पुकारा और हर्षित स्वर में कहा, “सोना! आज तो साक्षात अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न हुई हैं। रानी साहिबा के यहाँ से बुलावा आया है। सुना है पाँच सौ कड़ाहियों में शुद्ध घी की पूरियाँ और कचौड़ियाँ छन रही हैं। मिठाइयों का तो कोई अंत ही नहीं है।”

सोना भी इस समाचार से अत्यंत प्रसन्न हुईं, लेकिन उन्हें एक चिंता सता रही थी। उन्होंने पूछा, “पर स्वामी! क्या इस भोज में केवल आपको ही बुलाया गया है, या बच्चों के लिए भी कुछ व्यवस्था है?”

पंडित जी ने मुस्कुराते हुए अपनी बड़ी सी तोंद पर हाथ फेरा और कहा, “तुम चिंता क्यों करती हो? मैं ऐसी जुगत लगाऊँगा कि हमारे दोनों बालक—अलखराम और जोखू भी इस महायज्ञ में हिस्सा लेंगे। मैं उन्हें अपने साथ विद्वान शिष्यों के रूप में लेकर जाऊँगा।”

बच्चों को मिली भोजन की विशेष दीक्षा

महाभोज पर प्रस्थान करने से पहले, पंडित मोटेराम जी ने अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर एक विशेष ‘भोजन दीक्षा’ दी। यह दृश्य अत्यंत ही कौतुकपूर्ण था। पंडित जी ने बच्चों को समझाते हुए कहा:

  1. शुरुआत धीमी रखना: “देखो बच्चों, पत्तल सजते ही सीधे पूरियों पर टूट मत पड़ना। पहले धीरे-धीरे चबाकर खाना, ताकि पेट में हवा के लिए जगह न बचे और केवल माल ही माल अंदर जाए।”
  2. पानी से परहेज: “भोजन के बीच में पानी बिल्कुल मत पीना। पानी पीने से पेट जल्दी भर जाता है और कीमती मिठाइयों के लिए जगह कम पड़ जाती है।”
  3. लाज-शर्म का त्याग: “वहाँ संकोच करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब परोसने वाला आए, तो अपनी पत्तल बढ़ा देना और संकोच मत करना।”

पुत्रों ने अपने पिता के इन गुरु-मंत्रों को बड़े ध्यान से सुना और मन ही मन अपनी तैयारी पूरी कर ली।

महाभोज का दृश्य और पंडित जी का पराक्रम

जब पंडित मोटेराम शास्त्री अपने दोनों ‘शिष्यों’ के साथ रानी साहिबा के महल पहुंचे, तो वहाँ का भव्य नजारा देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। हवा में शुद्ध देसी घी, केसर और इलायची की खुशबू तैर रही थी। पंडित जी के मुंह में पानी आ गया।

पंडित जी और उनके बच्चों को बैठने के लिए उत्तम आसन दिए गए। जैसे ही पत्तल बिछी और परोसने वालों ने गरमा-गरम पूरियाँ, कचौड़ियाँ, विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ, रायता, रबड़ी और बालूशाही परोसनी शुरू की, पंडित जी की आँखें चमक उठीं।

पंडित जी ने अपने आराध्य देव का स्मरण किया और भोजन का श्रीगणेश किया। उनके हाथ इतनी तीव्र गति से चल रहे थे कि परोसने वाले भी हैरान थे। कड़ाही से निकली गर्म पूरियाँ सीधे पंडित जी के मुख-विवर में समाती जा रही थीं। उन्होंने अपने बच्चों की तरफ देखा, जो उनके निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे थे।

मोटेराम जी ने चिल्लाकर कहा, “अरे भाई परोसने वाले! जरा इधर भी ध्यान दो। यह कचौड़ी अत्यंत स्वादिष्ट है, चार-पाँच और रख दो। और हाँ, वह रबड़ी की बाल्टी जरा इधर लाना, पंडित जी का पेट अभी आधा भी नहीं भरा है!”

अति का अंत और हास्यप्रद परिणाम

भोजन का दौर घंटों चला। जब अंततः पंडित जी का हाथ रुका, तो उनकी स्थिति देखने लायक थी। अत्यधिक भोजन कर लेने के कारण उनका पेट किसी नगाड़े की तरह तन चुका था। उनसे अब सीधे बैठा भी नहीं जा रहा था। वे वहीं फर्श पर धीरे से लेट गए और लंबी-लंबी साँसें लेने लगे।

रानी साहिबा ने जब पंडित जी की यह दशा देखी, तो वे चिंतित हो गईं और उन्होंने तुरंत राजवैद्य को बुलवाया। राजवैद्य जी ने आकर जब पंडित जी की नब्ज टटोली, तो वे अपनी हँसी नहीं रोक पाए।

वैद्य जी ने मुस्कुराते हुए रानी साहिबा से कहा, “चिंता की कोई बात नहीं है। पंडित जी को कोई रोग नहीं है, बस इन्होंने अपनी क्षमता से चार गुना अधिक भोजन कर लिया है। यदि यह थोड़ा टहल लें, तो आराम मिल जाएगा।”

पंडित मोटेराम जी ने वहीं लेटे-लेटे कराहते हुए कहा, “वैद्य जी! टहलने की बात मत कीजिए। इस समय यदि कोई मुझे थोड़ा सा हिला भी देगा, तो अनर्थ हो जाएगा। बस कोई ऐसी अचूक औषधि दे दीजिए जो इस भोजन को तुरंत पचा दे, क्योंकि शाम को मुझे एक और यजमान के यहाँ ‘निमंत्रण’ में जाना है!”

पंडित जी की यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित रानी साहिबा, वैद्य जी और अन्य सभी दरबारी पेट पकड़कर हँसने लगे।

निष्कर्ष

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘निमंत्रण’ जहाँ हमें गुदगुदाती है, वहीं यह इंसानी लालच और मुफ्तखोरी की आदत पर एक तीखा व्यंग्य भी करती है। यह कहानी सिखाती है कि अति किसी भी चीज की बुरी होती है, चाहे वह स्वादिष्ट भोजन ही क्यों न हो।

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