
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के जीते-जाते दस्तावेज़ हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘बलिदान’ एक ऐसे किसान की व्यथा है, जिसके लिए उसकी ज़मीन केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उसका मान-सम्मान और गौरव थी। कहानी की शुरुआत होती है हरखचन्द (हरखू) से, जो गाँव का एक प्रतिष्ठित और खुशहाल व्यक्ति था। उसके पास हल-बैल थे, उपजाऊ ज़मीन थी और समाज में उसका एक नाम था। बीस साल पहले तक वह शक्कर का व्यवसाय करता था, लेकिन समय बदला और विदेशी शक्कर आने के कारण उसका धंधा मंदा पड़ गया। फिर भी, खेती की बदौलत उसने अपनी साख बचाए रखी।
गिरधारी का संकट और बदलता समय
जब हरखू की मृत्यु हुई, तो उसके पुत्र गिरधारी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। हरखू के अंतिम संस्कार में गिरधारी ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर खर्च किया, ताकि समाज में उसके पिता का नाम बना रहे। लेकिन यह दिखावा उसे आर्थिक रूप से तोड़ गया। ज़मींदार लाला ओंकारनाथ अब गिरधारी की उपजाऊ ज़मीन के लिए ज़्यादा ‘नज़राना’ (पगड़ी) माँग रहे थे। गिरधारी के पास इतने पैसे नहीं थे। गाँव के ही कालिका दीन ने ज़मींदार को भारी नज़राना देकर वह ज़मीन अपने नाम करवा ली, जो गिरधारी के पुरखों की थी।
ज़मीन के प्रति अटूट लगाव
ज़मीन हाथ से निकल जाने के बाद गिरधारी की स्थिति एक जीवित लाश जैसी हो गई। उसके लिए खेती केवल मेहनत का काम नहीं था, बल्कि वह उन खेतों के एक-एक ढेले को अपनी संतान की तरह प्यार करता था। अब जब वह उन खेतों के पास से गुज़रता, तो उसकी आँखों में आँसू आ जाते। उसे लगता जैसे उसकी आत्मा वहीं खेतों में ही भटक रही है।
गाँव के लोग उसे ढाँढस बँधाते, लेकिन गिरधारी को चैन कहाँ? उसने अपने बैलों को भी बेच दिया क्योंकि अब उन्हें खिलाने के लिए उसके पास न खेत थे और न ही चारा। जिस दिन उसके बैल बिके, उस रात वह फूट-फूट कर रोया। उसे लगा जैसे उसके जीवन का अंतिम आधार भी छिन गया हो। गिरधारी का स्वाभिमान उसे मजदूरी करने की इजाजत नहीं दे रहा था, क्योंकि वह कल तक खुद दूसरों को काम देता था।
मर्मस्पर्शी अंत और बलिदान
एक रात गिरधारी अचानक घर से गायब हो गया। उसकी पत्नी सुभागी और गाँव वालों ने उसे बहुत खोजा, लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला। उसी रात कालिका दीन, जिसने गिरधारी की ज़मीन ली थी, जब खेत जोतने पहुँचा, तो उसने देखा कि गिरधारी वहाँ खड़ा है। उसने सोचा गिरधारी वहाँ क्या कर रहा है? लेकिन जैसे ही वह पास गया, वह आकृति गायब हो गई।
गिरधारी का वह ‘बलिदान’ उसके स्वाभिमान की रक्षा के लिए था। उसने अपनी मिट्टी के लिए अपना प्राण त्याग दिया, लेकिन किसी दूसरे के अधीन होकर जीना स्वीकार नहीं किया। आज भी जब लोग प्रेमचंद की इस कहानी को पढ़ते हैं, तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि एक किसान के लिए उसकी ज़मीन केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान होती है।
निष्कर्ष
‘बलिदान’ कहानी ग्रामीण भारत के आर्थिक शोषण और सामाजिक प्रतिष्ठा की लड़ाई को बखूबी दर्शाती है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जब एक किसान से उसकी भूमि छीनी जाती है, तो वह केवल निर्धन नहीं होता, बल्कि वह अपना अस्तित्व ही खो देता है।
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