
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ हमेशा से ही समाज के उन पहलुओं को उजागर करती रही हैं, जिन्हें अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं। ‘बासी भात में खुदा का साझा’ भी एक ऐसी ही कथा है जो ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक विषमता को गहराई से चित्रित करती है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे एक छोटा सा भोजन का अंश भी किसी के जीवन में ईश्वर का रूप ले सकता है।
एक संपन्न पर अभिमानी घर
गाँव के एक छोर पर लाला रामसुख का बड़ा सा पक्का मकान था। लाला रामसुख गाँव के समृद्ध लोगों में गिने जाते थे। उनके पास जमीन-जायदाद की कोई कमी नहीं थी, लेकिन कमी थी तो बस एक कोमल हृदय की। उनके यहाँ हर दिन भारी मात्रा में भोजन बनता था और अक्सर बहुत सारा खाना बच भी जाता था। लेकिन लाला का यह नियम था कि बचा हुआ खाना या तो जानवरों को डाल दिया जाता या फेंक दिया जाता, पर किसी जरूरतमंद को देना उन्हें अपनी शान के खिलाफ लगता था।
उनका मानना था कि मुफ्त का खाना खिलाने से लोग आलसी हो जाते हैं। वे अक्सर कहते थे, “अगर आज बासी भात दिया, तो कल ये लोग ताजा रोटियों की उम्मीद करेंगे। खुदा ने जिसे जो दिया है, उसे उसी में संतोष करना चाहिए।”
गरीब दीनू की लाचारी
उसी गाँव में दीनू नाम का एक वृद्ध रहता था। दीनू कभी लाला के खेतों में मजदूरी करता था, पर अब उम्र और बीमारी ने उसे लाचार कर दिया था। उसके परिवार में कोई नहीं था। दो दिनों से उसके घर का चूल्हा नहीं जला था। भूख की तड़प ने उसे मजबूर कर दिया कि वह लाला के द्वार पर जाए।
शाम का वक्त था, लाला रामसुख अपने बरामदे में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। दीनू ने कांपते हाथों से अपनी फटी हुई अंगोछा फैलाया और बड़े ही दीन भाव से बोला, “लाला, दो दिन से पेट में अन्न का दाना नहीं गया है। सुना है रसोई में कुछ बासी भात (बचा हुआ चावल) पड़ा है, अगर वो मिल जाता तो इस बूढ़े की जान बच जाती।”
अहंकार और अन्न का अनादर
लाला ने दीनू को घृणा की दृष्टि से देखा। उन्होंने जोर से चिल्लाकर कहा, “अरे ओ दीनू! तुझे शर्म नहीं आती? भीख मांगते हुए फिर रहा है। जा यहाँ से, मेरे यहाँ कोई खैरात नहीं बंट रही। जो भात बचा है, वो कल सुबह गायों को खिलाया जाएगा। इंसानों को बासी खिलाकर मैं पाप का भागी नहीं बनना चाहता।”
दीनू की आँखों में आंसू आ गए। उसने कहा, “लाला, अन्न में तो खुदा का वास होता है। चाहे वो ताजा हो या बासी, वह भूख मिटाता है। उस बासी भात में भी खुदा का साझा है, क्योंकि वह किसी भूखे का पेट भर सकता है।” लाला ने उसकी बातों को अनसुना कर दिया और उसे वहां से भगा दिया।
वक्त का पहिया और सबक
कहते हैं कि वक्त का पहिया घूमते देर नहीं लगती। कुछ महीनों बाद गाँव में भयंकर अकाल पड़ा। फसलें सूख गईं और देखते ही देखते संपन्न लोग भी दाने-दाने को मोहताज होने लगे। लाला रामसुख की जमापूंजी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी। एक बार लाला किसी काम से दूसरे शहर जा रहे थे, लेकिन रास्ते में डाकुओं ने उन्हें लूट लिया। वे जंगल में रास्ता भटक गए।
दो दिनों तक भूखे-प्यासे भटकने के बाद लाला एक छोटी सी झोपड़ी के पास पहुंचे। वहां एक बूढ़ा व्यक्ति मिट्टी के बर्तन में कुछ खा रहा था। भूख के मारे लाला की हालत इतनी खराब थी कि उन्होंने बिना सोचे-समझे उस व्यक्ति से भोजन मांग लिया। उस वृद्ध ने बड़े प्रेम से अपना कटोरा लाला की ओर बढ़ा दिया। लाला ने देखा कि वह दो दिन पुराना बासी भात था, जिसमें पानी मिला हुआ था।
भूख में वह बासी भात लाला को दुनिया के सबसे स्वादिष्ट पकवान से भी बढ़कर लगा। खाते-खाते उनकी आँखों से आंसू गिर पड़े। तब उन्हें उस वृद्ध का चेहरा याद आया—वह दीनू ही था, जिसने अपनी झोपड़ी में लाला को शरण दी थी। दीनू ने उन्हें पहचान लिया था, लेकिन उसके मन में कोई बैर नहीं था।
निष्कर्ष
लाला रामसुख को समझ आ गया कि अन्न का हर दाना ईश्वर का उपहार है। उन्होंने दीनू के पैर पकड़ लिए और माफी मांगी। उन्होंने अनुभव किया कि असल में ‘बासी भात में खुदा का साझा’ होने का मतलब क्या है। इंसान का अहंकार उसे अंधा बना देता है, लेकिन भूख और विपत्ति उसे सच का आईना दिखा देती है। उस दिन के बाद लाला का जीवन पूरी तरह बदल गया और उन्होंने अपना शेष जीवन गरीबों की सेवा में लगा दिया।
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