
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज के उस यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती हैं जिसे अक्सर मुख्यधारा का समाज अनदेखा कर देता है। उनकी ऐसी ही एक महान और हृदयस्पर्शी कहानी है ‘पिसनहारी का कुआँ’ (Pishanhari Ka Kuan)। यह कहानी आत्मसम्मान, कठोर परिश्रम और नि:स्वार्थ परोपकार की एक अनूठी मिसाल पेश करती है। यह हमें सिखाती है कि महानता धन-दौलत से नहीं, बल्कि ऊंचे विचारों और नि:स्वार्थ कर्मों से मापी जाती है।
पिसनहारी का कठिन जीवन और उसका संकल्प
कहानी की मुख्य पात्र एक वृद्ध महिला है, जिसे गाँव के लोग आदर और उसके काम के कारण ‘पिसनहारी’ (आटा पीसने वाली) कहकर पुकारते हैं। उसका पूरा जीवन चक्की पीसने के कठिन श्रम में बीता। सुबह की पहली किरण से लेकर देर रात तक, उसकी चक्की की ‘घूं-घूं’ आवाज उसके अकेले जीवन का एकमात्र संगीत थी। वह पाई-पाई जोड़कर अपना जीवन बसर करती थी। उसका इस दुनिया में कोई अपना नहीं था—न पति, न संतान और न ही कोई सगा-संबंधी। इस नितांत अकेलेपन में भी उसने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया और अपने स्वाभिमान को हमेशा जिंदा रखा।
पिसनहारी का जीवन जितना कठिन था, उसका मन उतना ही कोमल और परोपकारी था। वह जिस गाँव में रहती थी, वहाँ गर्मियों के दिनों में पानी की भारी किल्लत हो जाती थी। राहगीर और ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते थे। तपती दुपहरी में राहगीरों को प्यास से व्याकुल देखकर पिसनहारी का दिल पसीज जाता था। इसी मानवीय पीड़ा से उसके भीतर एक महान संकल्प का जन्म हुआ—वह अपने जीवन की संचित पूंजी से गाँव के मुहाने पर एक कुआँ खुदवाएगी, ताकि कोई भी प्यासा राहगीर वहाँ से अतृप्त न लौटे।
उपहास और अटूट विश्वास
जब ग्रामीणों को पिसनहारी के इस संकल्प के बारे में पता चला, तो कई लोगों ने उसका उपहास उड़ाया। लोग पीठ पीछे कहते थे, “खुद के खाने का ठिकाना नहीं है और चली है कुआँ खुदवाने!” यहाँ तक कि गाँव के अमीर जमींदारों और सेठों को यह बात अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ लगी कि जो पुण्य कार्य वे अपने अकूत धन से न कर सके, वह एक मामूली चक्की पीसने वाली बुढ़िया करने जा रही है। लेकिन पिसनहारी इन तानों और उपहासों से तनिक भी विचलित नहीं हुई।
उसने अपनी चक्की की रफ्तार और तेज कर दी। अब वह रात को भी कम सोती और दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करती। उसका एकमात्र लक्ष्य था—कुआँ खुदवाने के लिए पर्याप्त धन इकट्ठा करना। वह रूखी-सूखी रोटी खाकर गुजारा करती और बचे हुए पैसे एक मिट्टी के घड़े में सहेज कर रखती। वर्षों की इस मूक साधना, आत्म-त्याग और कठोर तपस्या के बाद आखिरकार वह दिन आया जब उसके पास कुआँ खुदवाने लायक राशि जमा हो गई।
कुएँ का निर्माण और अमर कीर्ति
पिसनहारी ने बिना किसी शोर-शराबे के गाँव के मुख्य मार्ग पर कुआँ खुदवाने का काम शुरू करवा दिया। जैसे-जैसे कुआँ गहरा होता गया, वैसे-वैसे ग्रामीणों के मन में उसके प्रति उपहास का भाव आदर में बदल गया। अंततः, कुएँ से मीठा और शीतल जल का सोता फूट पड़ा। कुएँ के चारों ओर एक सुंदर चबूतरा बनाया गया ताकि थके-हारे राहगीर वहाँ बैठकर कुछ पल विश्राम कर सकें।
वह कुआँ केवल पानी का स्रोत नहीं था, बल्कि पिसनहारी के जीवनभर के पसीने की बूंदों का साक्षात् रूप था। जो लोग कभी उसका मजाक उड़ाते थे, आज वे ही उस शीतल जल को पीकर अपनी प्यास बुझा रहे थे और उस वृद्ध महिला को अंतर्मन से आशीर्वाद दे रहे थे। पिसनहारी ने अपने इस भगीरथ प्रयास से यह सिद्ध कर दिया कि परोपकार के लिए धनवान होना जरूरी नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और विशाल हृदय का होना आवश्यक है।
कहानी का गहरा संदेश
प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से समाज के खोखलेपन और दिखावे की संस्कृति पर करारा प्रहार किया है। जहाँ समाज के रसूखदार लोग अपनी तिजोरियाँ भरने और नाम कमाने के लिए दिखावटी दान-पुण्य करते हैं, वहीं पिसनहारी जैसी एक निर्धन महिला ने बिना किसी प्रचार के मानवता की सबसे बड़ी सेवा कर डाली। आज भी ‘पिसनहारी का कुआँ’ हमें यह मूल्यवान सीख देता है कि भौतिक वस्तुएं और धन-दौलत समय के साथ नष्ट हो जाते हैं, लेकिन नि:स्वार्थ भाव से किए गए सेवा कार्य इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं।
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