
मुगल साम्राज्य के इतिहास में बादशाह अकबर और उनके चतुर मंत्री बीरबल के किस्से आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने सदियों पहले थे। बीरबल की हाजिरजवाबी, तीक्ष्ण बुद्धि और व्यावहारिक ज्ञान के आगे बड़े-बड़े विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। अकबर जब भी किसी उलझन में होते या कोई कठिन सवाल उनके मन में उठता, तो वे बीरबल की शरण में जाते थे। ऐसा ही एक दिलचस्प वाकया तब हुआ जब अकबर के मन में मानवीय स्वभाव को लेकर एक अजीब शंका उत्पन्न हुई।
अकबर का अनोखा प्रश्न और बीरबल का तर्क
एक ठंडी शाम को बादशाह अकबर और बीरबल शाही बगीचे में टहल रहे थे। चारों तरफ हरियाली थी और ठंडी हवा चल रही थी। अचानक अकबर के मन में एक विचार आया। वे रुक गए और बीरबल की तरफ देखकर बोले, “बीरबल, इस दुनिया में अनेक प्रकार के लोग हैं। कुछ लोग अत्यंत वीर होते हैं जो मौत से भी नहीं डरते, और कुछ इतने डरपोक होते हैं जो अपनी परछाईं से भी कांप उठते हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि कोई मनुष्य एक ही समय में बेहद बहादुर भी हो और बेहद कायर भी?”
बीरबल ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “जहाँपनाह! यह न केवल संभव है, बल्कि इंसानी फितरत का एक सामान्य हिस्सा है। हर इंसान किसी न किसी परिस्थिति में बहादुर होता है और किसी न किसी चीज़ से जरूर डरता है। यानी एक ही व्यक्ति बहादुर भी हो सकता है और कायर भी।”
अकबर को बीरबल की यह बात हजम नहीं हुई। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुम्हारी बातें हमेशा पहेलियों जैसी होती हैं। भला एक शूरवीर योद्धा, जो युद्ध के मैदान में हजारों दुश्मनों का अकेले सामना करता है, वह कायर कैसे हो सकता है? मुझे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए। यदि तुम अपनी बात साबित नहीं कर पाए, तो तुम्हें अपनी हार माननी होगी।”
बीरबल ने हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए कहा, “जहाँपनाह, मुझे केवल तीन दिन का समय दीजिए। मैं आपके सामने एक ऐसे व्यक्ति को पेश करूँगा जो अपनी बहादुरी के लिए भी जाना जाता है और अपनी कायरता के लिए भी।”
बहादुर शमशेर सिंह और उसका गुप्त डर
चुनौती स्वीकार करने के बाद बीरबल ने तुरंत ऐसे व्यक्ति की खोज शुरू कर दी। बीरबल जानते थे कि केवल बातों से काम नहीं चलेगा, इसके लिए ठोस सबूत की आवश्यकता होगी। खोजबीन के दौरान बीरबल को मुगल सेना के एक सेनापति ‘शमशेर सिंह’ के बारे में पता चला।
शमशेर सिंह अपनी वीरता के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध था। उसने कई युद्धों में अपनी तलवार के दम पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे। जंगली जानवरों का शिकार करना उसके लिए बाएं हाथ का खेल था। वह इतना निडर था कि लोग उसे शेरदिल कहते थे। लेकिन बीरबल ने जब शमशेर सिंह के घरेलू जीवन और उसके निजी सेवकों से गुप्त रूप से पूछताछ की, तो उन्हें एक बहुत ही मजेदार और अजीब बात पता चली। शमशेर सिंह युद्ध के मैदान में तो शेर था, लेकिन उसे अपने घर में एक बेहद छोटी सी चीज़ से बेहद डर लगता था। वह चीज़ थी—’छिपकली’!
बीरबल को अपनी पहेली का हल मिल चुका था। उन्होंने अकबर के सामने अपनी बात साबित करने के लिए एक सटीक योजना बनाई।
राजदरबार में बीरबल का जाल
तीसरे दिन, बीरबल ने शमशेर सिंह को विशेष पुरस्कार देने के बहाने शाही दरबार में आमंत्रित किया। बादशाह अकबर सिंहासन पर विराजमान थे और सभी दरबारी अपनी-अपनी सीटों पर बैठे थे। शमशेर सिंह गर्व से सीना ताने दरबार के बीचो-बीच खड़ा था। उसकी कद-काठी और रौबीला चेहरा उसकी बहादुरी की गवाही दे रहे थे।
अकबर ने शमशेर सिंह को संबोधित करते हुए कहा, “सेनापति शमशेर सिंह! हमने तुम्हारी बहादुरी के कई किस्से सुने हैं। तुमने अकेले ही दलदल में फंसे हमारे सैनिकों को बचाया और डाकुओं के गिरोह का सफाया किया। तुम्हारी इस वीरता के लिए हम तुम्हें सम्मानित करना चाहते हैं।”
शमशेर सिंह ने झुककर सलाम किया और कहा, “जहाँपनाह, यह तो मेरा कर्तव्य था। मौत का डर तो मेरे करीब भी नहीं फटकता। मैं दुश्मनों की नंगी तलवारों के सामने भी मुस्कुराते हुए लड़ सकता हूँ।”
तभी बीरबल ने अपनी योजना को अंजाम देने का इशारा अपने एक खास सेवक को किया। वह सेवक चुपके से एक बंद डिब्बी लेकर शमशेर सिंह के ठीक पीछे खड़ा हो गया। जैसे ही शमशेर सिंह अपनी वीरता का बखान कर रहा था, सेवक ने चुपके से उस डिब्बी को खोल दिया। उस डिब्बी में से एक बड़ी सी छिपकली निकलकर सीधे शमशेर सिंह के कंधे पर जा गिरी और रेंगने लगी।
वीरता का गायब होना और कायरता का प्रदर्शन
जैसे ही शमशेर सिंह को अपने कंधे पर कुछ रेंगने का अहसास हुआ, उसने पीछे मुड़कर देखा। कंधे पर छिपकली देखते ही उस महान और निडर योद्धा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी आँखें डर के मारे बाहर निकल आईं। वह अपनी सारी वीरता और मान-मर्यादा भूलकर जोर-जोर से चीखने लगा, “बचाओ! बचाओ! कोई इसे हटाओ!”
वह पागलों की तरह उछलने-कूदने लगा। उसकी भारी-भरकम तलवार म्यान से निकलकर फर्श पर गिर गई। वह दरबारियों के बीच में भागने लगा और अंत में डर के मारे मंत्रियों की टेबल के नीचे छिपने की कोशिश करने लगा। वह थर-थर कांप रहा था और उसकी चीखें पूरे दरबार में गूंज रही थीं।
दरबार में सन्नाटा छा गया। बादशाह अकबर अपनी हंसी रोक नहीं पा रहे थे। वे पेट पकड़कर हंसने लगे। कुछ ही देर में बीरबल के सेवक ने उस छिपकली को वहां से हटा दिया। छिपकली के हटते ही शमशेर सिंह ने राहत की सांस ली, लेकिन वह शर्म से पानी-पानी हो गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी इस हरकत पर क्या सफाई दे।
बीरबल की सीख और अकबर की संतुष्टि
बीरबल आगे बढ़े और उन्होंने शमशेर सिंह को शांत कराया। फिर वे अकबर की ओर मुड़े और बोले, “जहाँपनाह! आपके सामने खड़े हैं शमशेर सिंह। युद्ध के मैदान में ये साक्षात यमराज हैं, जो मौत से भी नहीं डरते। इनकी इस बहादुरी का लोहा पूरा साम्राज्य मानता है। लेकिन वहीं दूसरी ओर, एक छोटी सी बेजान छिपकली के सामने ये इस कदर डर गए कि अपनी सुध-बुध खो बैठे। अब आप ही बताइए जहाँपनाह, क्या ये बहादुर हैं या कायर?”
अकबर मुस्कुराए और बोले, “बीरबल, तुम्हारी बात बिल्कुल सच है। तुमने आज मेरी शंका का समाधान कर दिया। मनुष्य का मन वास्तव में बहुत विचित्र है। कोई भी व्यक्ति हर परिस्थिति में एक जैसा नहीं रहता। हर बहादुर व्यक्ति के भीतर भी कोई न कोई डर छिपा होता है जो उसे कायर बना देता है।”
अकबर ने बीरबल की इस चतुराई की बेहद प्रशंसा की और उन्हें सोने की मोहरों से पुरस्कृत किया। शमशेर सिंह को भी उनकी वीरता के लिए सम्मानित किया गया और उन्हें यह सीख मिली कि अपनी कमजोरी को स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है।
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