
मुंशी प्रेमचंद की लेखनी हमेशा से समाज के उन पहलुओं को छूती रही है, जहाँ अक्सर इंसानियत और रूढ़िवादिता के बीच द्वंद्व चलता रहता है। उनकी कहानी ‘जिहाद’ भी एक ऐसी ही रचना है, जो धर्म के वास्तविक स्वरूप और मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले संघर्ष को बड़ी ही गहराई से उकेरती है।
धर्म और अडिग विश्वास
कहानी की शुरुआत एक ऐसे परिवेश से होती है जहाँ धार्मिक कट्टरता और अपने विश्वास के प्रति अटूट निष्ठा का बोलबाला है। प्रेमचंद यहाँ किसी धर्म विशेष की आलोचना नहीं करते, बल्कि उस मानसिकता को दर्शाते हैं जो धर्म के नाम पर बाहरी संघर्ष को तो ‘जिहाद’ मानती है, लेकिन अपने भीतर छिपी बुराइयों को नहीं देख पाती। कहानी का मुख्य पात्र एक ऐसा ही व्यक्ति है, जिसके हृदय में अपने धर्म के प्रति अगाध प्रेम है और वह उसे बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
उस समय के सामाजिक ताने-बाने में धर्म केवल प्रार्थना तक सीमित नहीं था, बल्कि वह व्यक्ति की पहचान और उसके अस्तित्व का हिस्सा बन गया था। इसी पहचान को बनाए रखने की जद्दोजहद में नायक खुद को एक ऐसी राह पर पाता है जिसे वह ‘पवित्र युद्ध’ समझता है।
अंतर्मन का वास्तविक द्वंद्व
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, प्रेमचंद नायक को एक ऐसी परिस्थिति में डालते हैं जहाँ उसकी धार्मिक कट्टरता का सामना मानवता से होता है। नायक जब युद्ध के मैदान या संघर्ष की स्थिति में पहुँचता है, तो उसे अहसास होता है कि जिसे वह शत्रु समझ रहा था, वह भी उसकी तरह ही एक हाड़-मांस का इंसान है, जिसकी अपनी मजबूरियाँ और भावनाएँ हैं।
यहीं से नायक के भीतर एक वास्तविक ‘जिहाद’ शुरू होता है—एक ऐसा युद्ध जो तलवारों से नहीं बल्कि विचारों से लड़ा जाता है। क्या धर्म किसी बेगुनाह का खून बहाने की इजाजत देता है? क्या ईश्वर केवल अपनों की मदद करने से खुश होता है? ये सवाल उसके मस्तिष्क में कौंधने लगते हैं। प्रेमचंद यहाँ बड़ी सूक्ष्मता से यह संदेश देते हैं कि सबसे बड़ा जिहाद अपने अहंकार, घृणा और अज्ञानता के खिलाफ लड़ना है।
मानवता की सर्वोच्चता
कहानी के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, नायक एक घायल व्यक्ति की सहायता करता है, जो उसके तथाकथित ‘दुश्मन’ खेमे से होता है। उस क्षण उसे जो आत्मिक शांति मिलती है, वह उसे हजारों धार्मिक अनुष्ठानों से भी प्राप्त नहीं हुई थी। उसे समझ आता है कि सेवा ही परमो धर्म है।
प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि मजहब इंसानियत को जोड़ने के लिए होना चाहिए, न कि तोड़ने के लिए। कट्टरता व्यक्ति की आँखों पर पट्टी बाँध देती है, जबकि करुणा उसे सत्य के दर्शन कराती है। नायक का हृदय परिवर्तन ही इस कहानी का चरमोत्कर्ष है, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम जिसे धर्म समझ रहे हैं, क्या वह वास्तव में प्रेम और सहिष्णुता पर आधारित है?
निष्कर्ष: वास्तविक जिहाद क्या है?
‘जिहाद’ कहानी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी वह अपने लेखन के समय थी। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए हमें अपने भीतर के संकीर्ण विचारों को त्यागना होगा। मुंशी प्रेमचंद ने अपनी सरल और प्रभावशाली भाषा के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और परोपकार से बड़ा कोई जिहाद नहीं है।
इस कहानी को पढ़कर पाठक न केवल प्रेमचंद की लेखन शैली से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, बल्कि जीवन के एक गहरे सत्य से भी परिचित होते हैं।
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