
मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में भारतीय समाज के हर वर्ग का जीवंत और सजीव चित्रण मिलता है। उनकी लेखनी केवल अमीरों या जमींदारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा और उसके स्वाभिमान को भी मुख्यधारा में लाया। ‘दफ्तरी’ (Daftari) कहानी भी एक ऐसे ही साधारण और निष्ठावान सरकारी कर्मचारी के जीवन पर आधारित है, जो अपने छोटे से काम को भी पूरी ईमानदारी और गर्व के साथ करता है।
अलादीन: कर्तव्य और ईमानदारी की मिसाल (Munshi Premchand)
कहानी का मुख्य पात्र अलादीन है, जो एक सरकारी दफ्तर में ‘दफ्तरी’ (फाइलें व्यवस्थित करने और अन्य फुटकर काम करने वाला कर्मचारी) के पद पर कार्यरत है। अलादीन का वेतन बहुत कम है, लेकिन उसका आत्मसम्मान और अपने काम के प्रति उसका समर्पण किसी बड़े अधिकारी से कम नहीं है। वह दफ्तर के धूल भरे कमरों, पुरानी फाइलों और कागजों की गंध के बीच अपनी पूरी जिंदगी बिता चुका है।
अलादीन के लिए उसका काम केवल आजीविका का साधन नहीं था, बल्कि उसके जीवन का उद्देश्य था। वह फाइलों को इस तरह से सहेज कर रखता था कि साहब के मांगते ही पलक झपकते ही फाइल उनके सामने हाजिर हो जाती थी। पूरे दफ्तर में उसकी इस कार्यकुशलता की तारीफ होती थी। बाबू लोग भले ही काम टालने के बहाने ढूंढते थे, लेकिन अलादीन हमेशा मुस्तैद रहता था।
दफ्तर का माहौल और अलादीन का मान-सम्मान (Munshi Premchand ki Kahani)
समय बीतने के साथ दफ्तर के पुराने अधिकारी सेवानिवृत्त हो गए और उनकी जगह नए विचारों और अंग्रेजी मिजाज वाले नए साहब आए। नए साहब का नाम मिस्टर सक्सेना था। वे अनुशासन और समय के पक्के तो थे, लेकिन उनके भीतर पुरानी पीढ़ी के प्रति सहानुभूति और सम्मान की कमी थी। वे हर काम में तेजी चाहते थे और उनका मानना था कि पुराने लोग दफ्तर के काम की गति को धीमा कर देते हैं।
अलादीन को नए साहब का यह रुख थोड़ा अजीब और दुखद लगा। वह जो काम दशकों से अपने तरीके से सलीके से करता आ रहा था, अब उसमें कमियां निकाली जाने लगीं। साहब अक्सर उस पर चिल्ला देते या उसे सुस्त कह देते। इन बातों से अलादीन का दिल बैठ जाता था, क्योंकि उसने अपने पूरे सेवाकाल में कभी किसी से कटु शब्द नहीं सुने थे।
एक छोटी सी भूल और आत्मसम्मान की परीक्षा (Munshi Premchand ki Kahani)
एक दिन दफ्तर में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और गोपनीय फाइल गायब हो गई। यह फाइल सीधे सरकार के बड़े प्रोजेक्ट से जुड़ी थी। पूरे दफ्तर में हड़कंप मच गया। बड़े बाबू से लेकर छोटे क्लर्क तक सभी फाइल ढूंढने में लग गए, लेकिन वह कहीं नहीं मिली।
साहब ने गुस्से में आकर अलादीन को अपने केबिन में बुलाया और उस पर लापरवाही का आरोप लगाया। साहब ने यहाँ तक कह दिया, “तुम जैसे पुराने लोग दफ्तर पर बोझ हो। तुम्हारी लापरवाही की वजह से आज इतनी बड़ी फाइल गायब हो गई। अगर फाइल शाम तक नहीं मिली, तो तुम्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाएगा और पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा।”
अलादीन के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस नौकरी को उसने मंदिर की तरह पूजा था, उस पर आज चोरी और लापरवाही का दाग लग रहा था। उसकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह जानता था कि उसने कभी कोई गलती नहीं की थी।
अलादीन ने ठंडे दिमाग से सोचना शुरू किया। वह साहब के केबिन में गया और साहब की मेज के नीचे, अलमारियों के पीछे और उनके सोफे के कोनों को ध्यान से देखने लगा। आखिरकार, उसकी पैनी नजरों ने साहब की मेज के एक बहुत ही संकीर्ण और छिपे हुए दराज (गुप्त ड्रॉर) को देख लिया। जब उसने उसे खोला, तो वह महत्वपूर्ण फाइल वहीं दबी हुई पड़ी थी, जिसे खुद साहब जल्दबाजी में रखकर भूल गए थे।
कहानी का समापन और सीख (Munshi Premchand ki Kahani)
फाइल मिलते ही साहब का गुस्सा शांत हो गया और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने अलादीन से माफी माँगने की कोशिश की और उसे इनाम के रूप में कुछ पैसे देने चाहे। लेकिन स्वाभिमानी अलादीन ने पैसे लेने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।
उसने साहब से हाथ जोड़कर कहा, “साहब, मेरे लिए मेरा काम और मेरी ईमानदारी ही मेरा सबसे बड़ा इनाम है। जब तक आप लोगों का भरोसा मुझ पर है, मुझे किसी और दौलत की जरूरत नहीं है। लेकिन आज मुझे समझ आ गया है कि अब मेरा समय पूरा हो चुका है।”
अगले ही दिन अलादीन ने अपनी सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के लिए आवेदन दे दिया। वह बिना किसी मलाल के, अपना सिर ऊँचा करके दफ्तर से विदा हो गया। प्रेमचंद जी की यह कहानी हमें सिखाती है कि व्यक्ति का सम्मान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके काम के प्रति उसकी निष्ठा और उसके चरित्र से आंका जाना चाहिए।
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