
प्रस्तावना
गरीब की आह में वो ताकत होती है जो बड़े से बड़े साम्राज्य को भी मिट्टी में मिला देती है। महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज के इसी कड़वे सच को बेहद खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ उजागर किया है। ‘गरीब की हाय’ भी एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी कहानी है जो हमें यह सिखाती है कि किसी लाचार और बेबस इंसान पर किया गया अत्याचार कभी खाली नहीं जाता। जब किसी असहाय व्यक्ति की आँखों से आँसू गिरते हैं, तो उसका खामियाजा अत्याचारी को भुगतना ही पड़ता है।
शंभू की लाचारी और लाला का क्रूर व्यवहार
एक छोटा सा सुंदर गाँव था, जहाँ शंभू नाम का एक गरीब और सीधा-साधा किसान रहता था। शंभू के पास अपनी दो बीघा जमीन और एक जोड़ी बैल थे, जो उसके जीवन और जीविका का एकमात्र सहारा थे। शंभू बेहद ईमानदार, मेहनती और संतोषी स्वभाव का व्यक्ति था। वह दिन-भर अपने खेतों में पसीना बहाता और जो कुछ भी रूखा-सूखा मिलता, उसी में खुश रहता था।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक साल गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई और शंभू के सामने दाने-दाने का संकट खड़ा हो गया। घर का खर्च चलाने और अगले साल के बीज खरीदने के लिए उसे गाँव के रसूखदार और लालची जमींदार लाला रामदयाल से कुछ पैसे उधार लेने पड़े।
लाला रामदयाल दिखने में तो बहुत धार्मिक था, माथे पर बड़ा सा तिलक लगाता था, लेकिन उसका दिल पत्थर का था। उसने शंभू को बेहद भारी ब्याज दर पर पैसे दे दिए। शंभू ने दिन-रात एक करके लाला का कर्ज चुकाने की कोशिश की। उसने अपने पेट पर पट्टी बांधी, खुद सूखी रोटियां खाईं और अपने परिवार को कष्ट में रखा, ताकि लाला का पाई-पाई कर्ज चुकता हो सके। लेकिन लाला का बही-खाता ऐसा जादुई था कि उसका कर्ज और ब्याज कभी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
बही-खाते का खेल और अत्याचार की पराकाष्ठा
एक दिन जब शंभू अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई लेकर लाला के पास पहुंचा, तो लाला ने अपना पुराना बही-खाता खोला। लाला ने बड़ी चालाकी से मुस्कुराते हुए कहा, “शंभू, तुमने जो पैसे दिए, वे तो सिर्फ अब तक के ब्याज में ही कट गए। असल रकम तो अभी भी वैसी की वैसी ही खड़ी है। अगर अगले हफ्ते तक तुमने पूरी रकम नहीं चुकाई, तो तुम्हारी जमीन और बैल मेरे हो जाएंगे।”
शंभू यह सुनकर सन्न रह गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उसने गिड़गिड़ाते हुए लाला के पैर पकड़ लिए और कहा, “माई-बाप! मैंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई आपके चरणों में रख दी। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा। मेरी जमीन और बैलों को छोड़ दीजिए, वरना मेरा परिवार भूखा मर जाएगा। मुझ गरीब पर रहम खाइए।”
लेकिन लाला का दिल नहीं पसीजा। उसने अपने लठैतों को हुक्म दिया और शंभू के बैलों को जबरन उसके खूंटे से खुलवाकर अपने घर ले आया। शंभू रोता रहा, चिल्लाता रहा और गाँव वालों से मदद की भीख मांगता रहा, लेकिन लाला के डर से किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उसके खिलाफ आवाज उठा सके। पूरे गाँव के सामने लाला ने शंभू को बेइज्जत करके भगा दिया।
गरीब की हाय (आह) और शंभू का अंत
अपने बैलों को खोने के बाद शंभू पूरी तरह टूट गया। उसके खेत सूने पड़ गए और उसके पास खेती का कोई साधन नहीं बचा। भूख, अपमान और सदमे के कारण शंभू की तबीयत दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। वह खाट पर लेट गया। मरते समय उसने आसमान की तरफ अपने कांपते हुए हाथ उठाए और रुंधे हुए गले से कहा, “हे न्यायकारी भगवान! आज एक गरीब की हाय इस जालिम को लगनी चाहिए। इसने मेरी रोजी-रोटी छीनी है, मेरी बेबसी का मजाक उड़ाया है। इसकी दौलत भी एक दिन इसी तरह धूल में मिल जाएगी।”
कुछ ही दिनों में शंभू ने दम तोड़ दिया। उसकी पत्नी और बच्चे दाने-दाने को मोहताज होकर गाँव छोड़कर चले गए। पूरा गाँव शंभू की इस बेबसी और दुखद अंत पर आँसू बहा रहा था, वहीं दूसरी तरफ क्रूर लाला रामदयाल अपनी हवेली में बैठकर अपनी बढ़ती हुई संपत्ति पर गर्व कर रहा था और जश्न मना रहा था।
न्याय का चक्र और लाला का विनाश
कहा जाता है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। शंभू की मौत के कुछ ही महीनों बाद लाला के बुरे दिन शुरू हो गए। सबसे पहले लाला के इकलौते बेटे को एक ऐसी रहस्यमयी बीमारी ने जकड़ लिया जिसका इलाज बड़े से बड़े वैद्यराज भी नहीं ढूंढ पाए। लाला ने अपने बेटे को बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया, लेकिन सब व्यर्थ रहा। उसका बेटा तड़प-तड़प कर लाला की आँखों के सामने ही मर गया।
अभी लाला इस गहरे सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि एक रात बिजली कड़कने के साथ उसकी अनाज की बड़ी गोदाम और हवेली में रहस्यमयी तरीके से भीषण आग लग गई। देखते ही देखते उसकी सारी जमा-पूंजी, गहने और अनाज राख के ढेर में बदल गए। इसके बाद उसके वफादार मुनीम ने भी उसे धोखा दिया और बचा-कुचा सारा खजाना लेकर फरार हो गया।
लाला रामदयाल अब पूरी तरह सड़क पर आ चुका था। जो लाला कभी दूसरों की जमीनों पर अवैध कब्जा करता था और गरीबों को सताता था, आज वह खुद भीख मांगने पर मजबूर था। गाँव के लोग जब भी उसे फटेहाल देखते, तो दबी जुबान में यही कहते, “यह और कुछ नहीं, बस गरीब शंभू की हाय का नतीजा है। गरीब की सिसकी कभी खाली नहीं जाती।”
निष्कर्ष
मुंशी प्रेमचंद की यह अमर कहानी हमें यह अमूल्य सीख देती है कि सत्ता, पद और पैसे के नशे में चूर होकर कभी किसी कमजोर, गरीब और लाचार व्यक्ति पर जुल्म नहीं करना चाहिए। गरीब का रोना और उसकी आह सीधे ईश्वर के दरबार तक पहुँचती है। जब गरीब की हाय लगती है, तो वह बड़े से बड़े पापी और उसके साम्राज्य का समूल विनाश कर देती है। इसलिए जीवन में हमेशा दया, करुणा, ईमानदारी और न्याय के मार्ग पर चलना चाहिए।
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