Visham Samsya – मुंशी प्रेमचंद

Visham Samsya

मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में भारतीय समाज के मध्यमवर्ग और ग्रामीण जीवन के यथार्थ का जो सजीव चित्रण मिलता है, वह विरला ही है। उनकी कहानी ‘विषम समस्या’ भी एक ऐसे ही पारिवारिक और सामाजिक द्वंद्व को रेखांकित करती है, जहाँ व्यक्ति अपने सिद्धांतों, आत्मसम्मान और परिस्थितियों के बीच फंसकर रह जाता है।

मर्यादा और विवशता का संघर्ष

कहानी के केंद्र में है एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार, जिसके मुखिया पंडित रमानाथ हैं। रमानाथ समाज में अपने ऊंचे नैतिक मूल्यों और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। उनकी आर्थिक स्थिति कभी बहुत अच्छी नहीं रही, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी चादर देखकर ही पैर पसारे। उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उनका आत्मसम्मान और उनकी ईमानदारी थी। परंतु, समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। मनुष्य के जीवन में परिस्थितियाँ कब करवट बदल लें, यह कोई नहीं जानता।

रमानाथ के घर में उनकी बेटी के विवाह का अवसर आया। आज के समाज में बेटी का विवाह केवल एक पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक कठिन सामाजिक परीक्षा भी बन चुका है। वर पक्ष की ओर से कोई खुली मांग तो नहीं थी, लेकिन उनकी मौन अपेक्षाएं और समाज में अपनी नाक बचाने की चिंता रमानाथ के सामने एक ‘विषम समस्या’ बनकर खड़ी हो गई।

अंतर्द्वंद्व की शुरुआत

रमानाथ की पत्नी भगवती देवी व्यावहारिक महिला थीं। वह जानती थीं कि समाज केवल आदर्शों पर नहीं चलता, वहाँ दिखावे की भी अपनी एक कीमत होती है। उन्होंने रमानाथ से कहा, “देखो जी, चाहे जो हो जाए, बेटी के ब्याह में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए। बिरादरी के लोग चार बातें बनाएंगे, तो हमारी ही बदनामी होगी। कुछ उधार ही ले लो, बाद में धीरे-धीरे चुका देंगे।”

रमानाथ इस बात के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि कर्ज लेना एक ऐसा दलदल है, जिसमें एक बार पैर धंसने के बाद इंसान पूरी जिंदगी उससे बाहर नहीं निकल पाता। उन्होंने भगवती को समझाने की कोशिश की, “कर्ज लेकर शान दिखाना खुद को अपने ही हाथों कुएं में धकेलने जैसा है। हम उतना ही करेंगे जितनी हमारी सामर्थ्य है।”

लेकिन समस्या केवल इतनी नहीं थी। वर पक्ष के लोग शहर के रईसों में गिने जाते थे। उनके स्वागत-सत्कार में थोड़ी सी भी कमी रमानाथ के पूरे परिवार को समाज की नजरों में नीचा दिखा सकती थी। इसी कशमकश में रमानाथ रात-रात भर सो नहीं पाते थे। उनके भीतर एक भयानक युद्ध चल रहा था—एक तरफ उनका स्वाभिमान और सिद्धांत थे, तो दूसरी तरफ उनकी बेटी का भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा।

समाज का दोहरा चरित्र

जैसे-जैसे विवाह की तिथि निकट आती गई, रमानाथ की चिंताएं और गहरी होती गईं। उन्होंने अपने कुछ करीबी मित्रों और रिश्तेदारों से मदद की गुहार लगाई। लेकिन समाज की यह भी एक कड़वी हकीकत है कि जब आपके पास धन होता है, तो सब साथ खड़े होते हैं, और जब संकट आता है, तो लोग कतराने लगते हैं। जिन लोगों पर रमानाथ को सबसे ज्यादा भरोसा था, उन्होंने ही ऐन वक्त पर हाथ खड़े कर लिए।

इस विषम परिस्थिति में रमानाथ को समझ आया कि जिन सिद्धांतों और ईमानदारी को उन्होंने जीवन भर अपनी सबसे बड़ी ताकत माना था, आज इस भौतिकवादी समाज में उनकी कोई कीमत नहीं रह गई थी। लोग व्यक्ति के चरित्र को नहीं, बल्कि उसकी जेब की गर्मी को देखकर सम्मान देते हैं।

निर्णय की घड़ी

अंततः, विवाह का दिन आ ही गया। रमानाथ ने अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए अंततः अपने सिद्धांतों से थोड़ा समझौता करने का मन बनाया, लेकिन अपनी आत्मा को पूरी तरह गिरने नहीं दिया। उन्होंने सादगी और शालीनता के साथ विवाह संपन्न कराने का निर्णय लिया। उन्होंने वर पक्ष से खुलकर अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बात की। यह एक बेहद साहसी कदम था, क्योंकि इसमें विवाह टूटने का भी जोखिम था।

परंतु, सत्य और सादगी की अपनी एक अदृश्य शक्ति होती है। रमानाथ की ईमानदारी देखकर वर पक्ष के मुखिया अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने आडंबरों को त्यागकर सादे समारोह में विवाह की रस्मों को पूरा करने की सहमति दे दी। इस प्रकार, रमानाथ ने अपनी उस ‘विषम समस्या’ का हल अपने सिद्धांतों की बलि चढ़ाए बिना, केवल सत्य और साहस के बल पर ढूंढ निकाला।

यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हों, यदि हम सत्य और मर्यादा की राह पर अडिग रहें, तो हर विषम समस्या का समाधान संभव है।

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