
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि वे समाज का वह दर्पण होती हैं जिसमें हम अपनी बुराइयों और विसंगतियों को स्पष्ट देख सकते हैं। उनकी कहानी ‘उपदेश’ भी एक ऐसी ही कालजयी रचना है, जो मनुष्य के पाखंड और उसकी कथनी और करनी के बीच की विशाल खाई को उजागर करती है।
पंडित मोंदराम का व्यक्तित्व
कहानी का मुख्य पात्र पंडित मोंदराम हैं, जो अपनी विद्वता और प्रवचनों के लिए आसपास के गाँवों में काफी प्रसिद्ध हैं। पंडित जी का शरीर भारी-भरकम था और उनकी वाणी में एक ऐसी मिठास थी कि जब वे बोलने लगते, तो श्रोता मुग्ध हो जाते थे। उनका मुख्य काम लोगों को संयम, सादगी और त्याग का ‘उपदेश’ देना था। वे अक्सर सभाओं में कहते थे कि मनुष्य को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए और जीभ के स्वाद के पीछे नहीं भागना चाहिए।
उपदेश की महिमा और जनता पर प्रभाव
पंडित जी का मानना था कि संसार की सभी वस्तुएं नश्वर हैं और मोह-माया दुखों का कारण है। वे बड़े भावपूर्ण तरीके से समझाते थे कि जो व्यक्ति भोजन का लोभी होता है, वह कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। लोग उनकी बातों से इतने प्रभावित होते कि उन्हें साक्षात् देवता समझने लगते थे। गाँव के लोग अपनी सामर्थ्य अनुसार उन्हें दान-दक्षिणा देते और उनके चरणों की धूल सिर पर लगाते।
एक विशेष निमंत्रण और पंडित जी की परीक्षा
एक दिन पंडित जी को पास के एक धनवान यजमान के यहाँ से भोजन का निमंत्रण मिला। यजमान ने बड़े प्रेम से कहा, “महाराज, आपके चरणों के स्पर्श से मेरा घर पवित्र हो जाएगा। कृपया पधारें और भोजन ग्रहण करें।” पंडित जी ने पहले तो थोड़ा संकोच दिखाया, जैसा कि उनकी सादगी का ढोंग था, लेकिन फिर ‘लोक कल्याण’ के नाम पर मान गए।
उस दिन यजमान के घर पर विशेष प्रबंध किए गए थे। जैसे ही पंडित जी वहां पहुंचे, शुद्ध घी की बनी कचौड़ियों, हलवे और तरह-तरह के पकवानों की खुशबू उनके नथुनों से टकराई। पंडित जी, जो अब तक सबको ‘इंद्रिय संयम’ का पाठ पढ़ा रहे थे, उस खुशबू के आगे विवश होने लगे। उनके मन में चल रहे ‘उपदेश’ और पेट की ‘भूख’ के बीच एक युद्ध शुरू हो गया।
कथनी और करनी का अंतर
भोजन की थाली जैसे ही सामने आई, पंडित जी के सारे प्रवचन हवा हो गए। जो व्यक्ति सुबह तक लोगों को बता रहा था कि भोजन केवल शरीर को चलाने के लिए करना चाहिए, वही व्यक्ति अब पकवानों पर इस तरह टूट पड़ा जैसे उसने जन्मों से कुछ न खाया हो। यजमान बड़े चाव से पंडित जी को भोजन करा रहे थे और पंडित जी बिना रुके खाते जा रहे थे।
जब उनका पेट पूरी तरह भर गया और सांस लेना भी मुश्किल हो गया, तब उन्हें याद आया कि उन्होंने तो लोगों को कम खाने का उपदेश दिया था। लेकिन यहाँ तो स्थिति कुछ और ही थी। प्रेमचंद ने यहाँ बड़े ही सूक्ष्म तरीके से दिखाया है कि उपदेश देना जितना सरल है, उस पर स्वयं अमल करना उतना ही कठिन।
कहानी का निष्कर्ष और संदेश
‘उपदेश’ कहानी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी वह दशकों पहले थी। समाज में ऐसे ‘उपदेशकों’ की कमी नहीं है जो मंच से तो नैतिकता और आदर्श की बातें करते हैं, लेकिन निजी जीवन में वे उन्हीं बुराइयों में लिप्त रहते हैं जिन्हें वे कोसते हैं।
प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा ज्ञान वह नहीं है जो दूसरों को दिया जाए, बल्कि वह है जिसे हम स्वयं के जीवन में उतार सकें। दिखावे की भक्ति और पाखंडी उपदेश कभी भी समाज का भला नहीं कर सकते। अंततः, पंडित मोंदराम का चरित्र हमें खुद के भीतर झांकने और अपनी कमियों को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
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