
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय ग्रामीण जीवन और मानव स्वभाव का इतना जीवंत चित्रण करती हैं कि पाठक खुद को उस परिवेश का हिस्सा मानने लगता है। उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘गुरु मंत्र’ भी है, जो न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि समाज में व्याप्त पाखंड और भोलेपन पर करारा प्रहार भी करती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन का असली मंत्र क्या है।
एक सरल मन की जिज्ञासा
गाँव के एक सीधे-सादे व्यक्ति, जिन्हें अपनी मेहनत से ज्यादा ‘तकदीर’ और ‘चमत्कार’ पर भरोसा था, हमेशा इस तलाश में रहते थे कि कहीं से कोई ऐसी युक्ति मिल जाए जिससे रातों-रात उनकी किस्मत बदल जाए। उनका मानना था कि बड़े-बड़े संतों और महात्माओं के पास कुछ ऐसे ‘गुरु मंत्र’ होते हैं, जिन्हें सिद्ध कर लेने पर दुनिया की कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।
उनका मन खेती-बाड़ी में कम और साधु-संतों की सेवा में अधिक लगता था। जब भी गाँव में कोई महात्मा पधारते, वे अपनी झोली लेकर उनके चरणों में पहुँच जाते। उनकी इसी लालसा ने उन्हें कई बार धोखे भी दिलवाए, लेकिन उनकी श्रद्धा टस से मस न हुई।
महात्मा जी का आगमन
एक बार गाँव के बाहर एक बरगद के पेड़ के नीचे एक भव्य महात्मा जी ने अपना डेरा डाला। महात्मा जी के चेहरे पर ओज था और उनकी वाणी में गजब का आकर्षण। देखते ही देखते गाँव के लोगों का ताँता लग गया। हमारे कथानायक भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि इस बार वे महात्मा जी से वह गुप्त ‘गुरु मंत्र’ लेकर ही रहेंगे, जिससे दरिद्रता दूर हो जाती है।
वे रोज महात्मा जी की सेवा करते, उनके लिए लकड़ियाँ काटते, दूध का प्रबंध करते और घंटों उनके पैर दबाते। कई दिनों की निस्वार्थ सेवा के बाद महात्मा जी प्रसन्न हुए और बोले, “वत्स, तुम्हारी सेवा से मैं प्रसन्न हूँ। बताओ, क्या चाहते हो?”
मंत्र की प्राप्ति और शर्त
नायक ने हाथ जोड़कर विनती की, “महाराज, मुझे वह गुरु मंत्र दीजिये जिससे मेरी सारी दरिद्रता मिट जाए और मुझे जीवन में कभी कष्ट न उठाना पड़े।” महात्मा जी मुस्कराए और उनके कान में एक गुप्त मंत्र फूँक दिया। साथ ही एक कड़ी शर्त भी रखी। उन्होंने कहा, “यह मंत्र तभी फलित होगा जब तुम इसका जाप करते समय ‘बंदर’ के बारे में बिल्कुल नहीं सोचोगे। यदि मंत्र पढ़ते समय बंदर का विचार मन में आया, तो मंत्र निष्फल हो जाएगा।”
नायक बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि यह तो बहुत आसान काम है। उसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बंदरों के बारे में इतना गंभीरता से नहीं सोचा था, तो फिर आज मंत्र पढ़ते समय क्यों सोचेगा?
मन का खेल और असफलता
जैसे ही वह घर लौटा और आँखें बंद करके मंत्र का जाप शुरू किया, उसके दिमाग में सबसे पहले एक बंदर की तस्वीर उभरी। उसने झट से आँखें खोलीं और खुद को झिड़का। उसने फिर कोशिश की, लेकिन अब तो जैसे बंदरों की पूरी फौज उसके दिमाग में नाचने लगी। लाल मुँह वाले बंदर, काले मुँह वाले बंदर, पेड़ों पर कूदते बंदर—हर तरफ उसे बंदर ही बंदर दिखने लगे।
जितना वह बंदरों को मन से निकालने की कोशिश करता, वे उतनी ही मजबूती से उसके विचारों में बैठ जाते। पूरी रात निकल गई, लेकिन वह एक बार भी बिना बंदर का विचार लाए मंत्र पूरा नहीं कर सका।
जीवन का असली बोध
अगले दिन वह रोता हुआ महात्मा जी के पास पहुँचा और अपनी व्यथा सुनाई। महात्मा जी हँसते हुए बोले, “बेटा, यही मन का स्वभाव है। हम जिस बुराई या विचार को जबरदस्ती दबाना चाहते हैं, वह उतना ही बड़ा होकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है। असली ‘गुरु मंत्र’ किसी शब्द में नहीं, बल्कि अपने मन पर नियंत्रण और कर्म की शुद्धता में है। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, केवल निरंतर परिश्रम ही वह मंत्र है जो गरीबी को दूर कर सकता है।”
प्रेमचंद की यह कहानी हमें समझाती है कि हम बाहरी आडंबरों और जादुई समाधानों के पीछे भागते रहते हैं, जबकि असली समाधान हमारे अपने भीतर और हमारे कर्मों में छिपा होता है। मन को वश में करना और सही दिशा में मेहनत करना ही सबसे बड़ा गुरु मंत्र है।
Recommended Reads:
Discover more from StoryDunia
Subscribe to get the latest posts sent to your email.









