
प्रस्तावना
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे मानव जीवन, सामाजिक कुरीतियों और मानवीय मनोविज्ञान का एक जीवंत दस्तावेज हैं। उनकी कहानी ‘भेद’ (Bhaid) भी एक ऐसी ही अमर रचना है जो समाज में व्याप्त पाखंड, वर्ग-भेद और इंसानी स्वभाव के दोहरे चेहरे को उजागर करती है। यह कहानी हमें आत्म-मंथन करने पर मजबूर करती है कि आखिर सच्चा धर्म और मानवता क्या है।
समाज का दोहरा चेहरा और पंडित दीनानाथ
गाँव के एक सम्मानित और समृद्ध परिवार के मुखिया पंडित दीनानाथ अपनी धार्मिकता और कर्मकांड के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। उनके द्वार से कोई भी साधु-संत बिना भोजन किए नहीं लौटता था। सुबह-शाम उनके घर से शंख और घंटियों की आवाजें गूँजती रहती थीं। लोग उन्हें साक्षात धर्म का अवतार मानते थे। लेकिन इस बाहरी चमक-दमक के पीछे एक गहरा ‘भेद’ छिपा हुआ था।
पंडित दीनानाथ जितने बाहर से उदार और धार्मिक दिखते थे, भीतर से उतने ही कठोर, जातिवादी और स्वार्थी थे। उनके लिए धर्म केवल अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बनाए रखने का एक साधन था। वे गरीबों और शोषितों को अछूत समझते थे और उन्हें अपने पास फटकने भी नहीं देते थे।
सुखिया का निस्वार्थ जीवन
उसी गाँव के एक कोने में सुखिया नाम का एक बेहद गरीब और तथाकथित नीची जाति का व्यक्ति रहता था। वह दिन-भर मजदूरी करता, मिट्टी ढोता और पसीना बहाता था। उसे जो कुछ भी रूखा-सूखा मिलता, वह उसी में संतुष्ट रहता था। सुखिया के पास न तो पंडित जी जैसा बड़ा घर था और न ही तिजोरी में सोने-चांदी के सिक्के। लेकिन उसके पास एक संवेदनशील और परोपकारी दिल था।
सुखिया अक्सर भूखे राहगीरों और लाचार पशु-पक्षियों की मदद करता था। गाँव के लोग उसका उपहास उड़ाते थे कि खुद भूखा रहने वाला दूसरों का पेट भरने चला है। पंडित दीनानाथ भी सुखिया को देखकर नाक-भौं सिकोड़ते थे और कहते थे कि नीच जाति के लोग भला धर्म का मर्म क्या समझें!
वह तूफानी रात और सत्य की परीक्षा
एक बार आषाढ़ के महीने में भयानक तूफान आया। कड़कती बिजली और मूसलाधार बारिश ने पूरे गाँव को अपनी चपेट में ले लिया। चारों तरफ पानी ही पानी हो गया और हवा इतनी ठंडी थी कि हड्डियाँ काँप जाएं। आधी रात के समय, एक वृद्ध और बीमार मुसाफिर गाँव में शरण की तलाश में भटक रहा था।
ठंड से ठिठुरते हुए उसने सबसे पहले पंडित दीनानाथ के विशाल और पक्के मकान का दरवाजा खटखटाया। पंडित जी ने खिड़की से झाँककर देखा। मुसाफिर के फटेहाल और गंदे कपड़े देखकर पंडित जी का मन घृणा से भर गया। उन्होंने सोचा कि यदि इस अछूत और बीमार व्यक्ति को अंदर आने दिया, तो उनका पवित्र घर अपवित्र हो जाएगा और उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।
पंडित जी ने कड़कड़ाती आवाज में कहा, “आगे बढ़ो बाबा, यहाँ तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। किसी सराय में जाकर सिर छुपाओ।”
निराश और थका हुआ वृद्ध आगे बढ़ा। चलते-चलते वह सुखिया की टूटी-फूटी झोपड़ी के सामने पहुँचा, जहाँ से हल्की सी रोशनी छनकर बाहर आ रही थी। मुसाफिर ने काँपते हाथों से दरवाजा खटखटाया।
मानवता का सच्चा प्रकाश
जैसे ही सुखिया ने दरवाजा खोला, उसने एक असहाय वृद्ध को जीवन और मौत के बीच जूझते देखा। सुखिया ने बिना एक पल गँवाए वृद्ध को अंदर बुला लिया। उसकी झोपड़ी में जगह बहुत कम थी और छत से पानी भी टपक रहा था। लेकिन सुखिया ने अपनी सूखी चटाई उस वृद्ध के लिए बिछा दी।
घर में खाने के लिए केवल दो सूखी रोटियां थीं, जो सुखिया ने अपने लिए रखी थीं। उसने वह रोटियां और थोड़ा गरम पानी उस भूखे मुसाफिर के सामने रख दिया। वृद्ध ने तृप्त होकर भोजन किया और सुखिया के निस्वार्थ प्रेम को देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए। सुखिया खुद रात भर एक कोने में बैठकर जागता रहा ताकि मेहमान आराम से सो सके।
‘भेद’ का उजागर होना
अगली सुबह बारिश थम चुकी थी। सूर्य की पहली किरण के साथ ही गाँव के लोग अपने-अपने कामों में लग गए। पंडित दीनानाथ जब गंगा स्नान कर लौट रहे थे, तो उन्होंने देखा कि वह वृद्ध मुसाफिर सुखिया की झोपड़ी से मुस्कुराते हुए बाहर निकल रहा है। उस वृद्ध के चेहरे पर एक अलौकिक तेज था।
पंडित जी ने व्यंग्य करते हुए सुखिया से कहा, “क्यों रे सुखिया, तूने कल रात एक अज्ञात और मलीन व्यक्ति को अपने घर में रखकर अपनी झोपड़ी को और भी अपवित्र कर लिया? धर्म-कर्म का कुछ ज्ञान है भी या नहीं?”
तभी उस वृद्ध मुसाफिर ने पीछे मुड़कर पंडित जी की तरफ देखा और शांत स्वर में कहा, “पंडित जी, कल रात मैंने भगवान के दो मंदिरों के दर्शन किए। एक मंदिर वह था जो बाहर से भव्य था, लेकिन उसके भीतर केवल अंधकार और संकीर्णता का वास था। दूसरा मंदिर यह टूटी झोपड़ी थी, जिसके भीतर दया, करुणा और सच्ची मानवता की दिव्य ज्योति जल रही थी। आज ईश्वर और पाखंड के बीच का सारा ‘भेद’ मेरे सामने स्पष्ट हो गया है।”
यह सुनते ही पंडित दीनानाथ के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके पास इस सत्य का कोई जवाब नहीं था। उनका सारा अहंकार चूर-चूर हो चुका था और वे बिना कुछ बोले ग्लानि से सिर झुकाकर वहाँ से चले गए।
निष्कर्ष
मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि सच्चा धर्म कर्मकांडों या ऊंचे कुल में जन्म लेने से नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और परोपकार की भावना से तय होता है। बाहरी आडंबरों और आंतरिक सच्चाई का यही ‘भेद’ इस कहानी की मूल आत्मा है।
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