Sawan Kamika Ekadashi 2026; 8 या 9 अगस्त, कब है व्रत? जानें पारण का समय

Sawan Kamika Ekadashi

श्रावण मास भगवान शिव की भक्ति और आराधना के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। लेकिन इसी अत्यंत पवित्र महीने में आने वाली कामिका एकादशी भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त करने का भी एक महा-अवसर प्रस्तुत करती है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को ‘कामिका एकादशी’ (Kamika Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में इस एकादशी को अत्यंत कल्याणकारी, सभी पापों का नाश करने वाली और भक्तों की सभी मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाली माना गया है।

आइए जानते हैं कामिका एकादशी का पौराणिक महत्व, इसकी पावन व्रत कथा और पूजा की संपूर्ण विधि।

कामिका एकादशी का पौराणिक महत्व (Significance of Kamika Ekadashi)

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया है। महाभारत काल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को कामिका एकादशी का महत्व समझाते हुए कहा था कि जो फल बड़े-बड़े यज्ञों, जैसे अश्वमेध यज्ञ, के अनुष्ठान से मिलता है, वह फल श्रद्धापूर्वक कामिका एकादशी का व्रत रखने मात्र से प्राप्त हो जाता है।

इस पावन दिन पर भगवान विष्णु के ‘श्रीधर’ रूप की पूजा-अर्चना की जाती है। माना जाता है कि जो मनुष्य इस दिन शंख, चक्र और गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उन्हें देव, गंधर्व और सूर्य आदि की पूजा का फल स्वतः ही मिल जाता है। गंगा, काशी, नैमिषारण्य या पुष्कर जैसे महान तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से सुलभ हो जाता है। विशेष रूप से, इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अर्पित करने का अनंत गुणा फल मिलता है।

कामिका एकादशी व्रत कथा (Kamika Ekadashi Vrat Katha)

धर्मराज युधिष्ठिर के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण ने इस एकादशी की पावन कथा का वर्णन इस प्रकार किया था:

प्राचीन काल में एक गाँव में एक अत्यंत साहसी और क्रोधी स्वभाव का क्षत्रिय जमींदार रहता था। एक दिन किसी बात को लेकर उसका गाँव के एक सम्मानित ब्राह्मण के साथ तीव्र विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ गया कि क्रोध के आवेश में आकर उस जमींदार ने ब्राह्मण की हत्या कर दी।

ब्राह्मण की मृत्यु के बाद जमींदार का क्रोध शांत हुआ और उसे अपनी भयानक भूल का अहसास हुआ। उसे पश्चाताप की अग्नि जलाने लगी। उसने ब्राह्मण समाज से हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वह मृतक ब्राह्मण का दाह संस्कार स्वयं अपनी देखरेख में करना चाहता है। परंतु, सभी ब्राह्मणों ने उसके इस निवेदन को सिरे से खारिज कर दिया और कहा, “तुम पर ब्रह्महत्या का महापाप लगा है। जब तक तुम इस पाप का प्रायश्चित नहीं कर लेते, तब तक हम तुम्हारे हाथ का दिया अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे और न ही तुम्हारे किसी अनुष्ठान में भाग लेंगे।”

जमींदार अत्यंत दुखी और व्याकुल हो गया। वह अपने इस महापाप से मुक्ति पाने का मार्ग खोजने लगा। भटकते हुए वह एक जंगल में एक तपस्वी मुनि के आश्रम पहुंचा। उसने मुनि के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी पूरी व्यथा सुनाई और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने का उपाय पूछा।

मुनि ने दयापूर्वक उसे सांत्वना दी और कहा, “हे वत्स! तुम्हारा पाप अत्यंत गंभीर है, परंतु भगवान विष्णु की शरण में जाने से हर पाप का शमन संभव है। तुम श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का व्रत पूरे श्रद्धा भाव से करो। उस दिन निराहार रहकर भगवान विष्णु की पूजा करो, रात्रि में जागरण करो और अगले दिन ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराकर दान-दक्षिणा दो। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम अवश्य ही इस घोर पाप से मुक्त हो जाओगे।”

मुनि के आदेशानुसार, जमींदार ने कामिका एकादशी का व्रत अत्यंत श्रद्धा, नियम और निष्ठा के साथ रखा। उसने दिनभर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप किया, संध्या को दीपदान किया और पूरी रात प्रभु की भक्ति में लीन रहकर जागरण किया।

उसकी सच्ची निष्ठा और गहरे पश्चाताप को देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। रात्रि के अंतिम पहर में भगवान विष्णु ने उसे सपने में साक्षात दर्शन दिए और कहा, “हे पुत्र! मैं तुम्हारी भक्ति और इस पावन व्रत के प्रभाव से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारी सच्ची पश्चाताप की भावना ने तुम्हें निष्पाप कर दिया है। तुम अब ब्रह्महत्या के दोष से पूरी तरह मुक्त हो।”

इस प्रकार कामिका एकादशी व्रत के प्रताप से वह जमींदार पापमुक्त हो गया और मृत्यु के पश्चात उसे वैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई।

कामिका एकादशी पूजा विधि (Kamika Ekadashi Puja Vidhi)

कामिका एकादशी के दिन पूजा के विशेष नियम और विधियाँ शास्त्रों में बताई गई हैं:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जागरण: एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं और पीले वस्त्र धारण करें।
  2. व्रत का संकल्प: भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
  3. पूजा अर्चना: मंदिर को साफ कर भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। उन्हें रोली, गोपी चंदन, पीले फूल, फल और धूप-दीप अर्पित करें।
  4. तुलसी पूजन: भगवान विष्णु को तुलसी दल (तुलसी पत्ता) अत्यंत प्रिय है। उन्हें तुलसी दल अवश्य अर्पित करें। मान्यता है कि तुलसी चढ़ाने से भगवान विष्णु जल्दी प्रसन्न होते हैं।
  5. कथा श्रवण: कामिका एकादशी की व्रत कथा को स्वयं पढ़ें या परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर सुनें।
  6. दीपदान और आरती: शाम के समय तुलसी के पौधे के सामने और भगवान विष्णु के मंदिर में घी का दीपक अवश्य जलाएं और विष्णु आरती गाएं।
  7. रात्रि जागरण: इस रात को सोएं नहीं, बल्कि भगवान के भजनों और मंत्रों का जाप करते हुए रात्रि जागरण करें।
  8. पारण (व्रत खोलना): अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं, दान दें और इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

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