
सावन का पावन महीना आते ही चारों तरफ प्रकृति हरी-भरी चादर ओढ़ लेती है। रिमझिम फुहारों के बीच मिट्टी की सोंधी महक और चारों ओर फैली हरियाली मन को असीम शांति प्रदान करती है। इसी सुहावने मौसम में आता है हिंदू धर्म का एक बेहद खास और पवित्र त्योहार—हरियाली तीज। सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार मुख्य रूप से महिलाओं, विशेषकर सुहागिन स्त्रियों के लिए अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं।
हरियाली तीज का पौराणिक महत्व
हरियाली तीज का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह पावन दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। उनके इस कठिन और निस्वार्थ प्रेम की याद में ही हर साल महिलाएं इस व्रत को अत्यंत श्रद्धाभाव से रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन जो भी महिला सच्चे मन से माता पार्वती और शिव जी की पूजा करती है, उसे अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान मिलता है।
हरियाली तीज की पावन व्रत कथा (Vrat Katha)
शिव पुराण के अनुसार, माता पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में ही भगवान शिव को अपना पति मान लिया था। सती के रूप में प्राण त्यागने के बाद, उन्होंने हिमालय राज के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। इस जन्म में भी उनका एकमात्र संकल्प भगवान शिव को ही पति के रूप में प्राप्त करना था।
पार्वती जी ने अपने आराध्य को पाने के लिए अन्न-जल का त्याग कर दिया और गंगा नदी के तट पर अत्यंत कठिन तपस्या शुरू कर दी। उन्होंने वर्षों तक केवल सूखे पत्ते खाए और घोर सर्दी, गर्मी तथा बरसात की परवाह किए बिना अपनी साधना में लीन रहीं। उनकी इस कठिन परिस्थिति को देखकर उनके पिता पर्वतराज हिमालय अत्यंत व्याकुल और दुखी थे।
इसी दौरान, एक दिन देवर्षि नारद पर्वतराज हिमालय के पास पहुंचे और उनसे कहा, “हे राजन्! आपकी पुत्री की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनसे विवाह करना चाहते हैं। मैं उनका यह प्रस्ताव लेकर आपके पास आया हूँ।” पर्वतराज ने इसे अपना परम सौभाग्य समझा और सहर्ष स्वीकृति दे दी।
जब माता पार्वती को इस बात की सूचना मिली, तो वे अत्यंत दुखी और व्याकुल हो गईं। वे तो मन, वचन और कर्म से भगवान शिव को अपना सब कुछ सौंप चुकी थीं। रोती हुई पार्वती अपनी एक प्रिय सखी के पास गईं और अपनी व्यथा सुनाई। उनकी सखी अत्यंत चतुर और समझदार थी। उसने पार्वती जी से कहा, “सखी, तुम विलाप मत करो। मैं तुम्हें एक ऐसे घने जंगल में ले चलती हूँ, जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हें ढूंढ नहीं पाएंगे और तुम वहाँ अपनी साधना पूरी कर सकोगी।”
पार्वती जी अपनी सखी की बात मानकर घने जंगल की एक गुफा में चली गईं। वहाँ उन्होंने रेत (मिट्टी) से एक शिवलिंग का निर्माण किया और निराहार रहकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। यह सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया का दिन था। माता पार्वती की इस निस्वार्थ और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।
बाद में, जब पर्वतराज हिमालय वहां पहुंचे, तो पार्वती जी ने उन्हें अपनी तपस्या और संकल्प के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वे केवल भगवान शिव से ही विवाह करेंगी। पुत्री के दृढ़ संकल्प को देखकर पर्वतराज ने उनका विवाह पूरे विधि-विधान से महादेव के साथ संपन्न कराया। तभी से इस पावन तिथि को ‘हरियाली तीज’ के रूप में मनाया जाता है।
उत्सव, श्रृंगार और परंपराएं
हरियाली तीज का त्योहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्सव और उमंग का महापर्व है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। हरे रंग को समृद्धि, प्रकृति और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस दिन महिलाएं विशेष रूप से हरी साड़ियां, हरी चूड़ियां पहनती हैं और अपने हाथों में सुंदर मेहंदी रचाती हैं।
इस त्योहार पर झूला झूलने की भी एक प्राचीन और सुप्रसिद्ध परंपरा है। बाग-बगीचों में पेड़ों पर बड़े-बड़े झूले डाले जाते हैं, जहाँ महिलाएं और नवविवाहिताएं एकत्रित होकर मल्हार गाती हैं और झूला झूलती हैं। इस अवसर पर नवविवाहिताओं के मायके से ‘सिंजारा’ भेजने की परंपरा है। सिंजारे में सुहाग का सामान, नए कपड़े, फल और पारंपरिक मिठाइयां जैसे घेवर और गुझिया भेजी जाती हैं।
हरियाली तीज पूजा विधि
हरियाली तीज के दिन पूजा के लिए निम्नलिखित विधि अपनाई जाती है:
- सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर नए व सुंदर वस्त्र धारण करें।
- पूजा के स्थान को साफ करके गंगाजल छिड़कें और मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की सुंदर प्रतिमाएं बनाएं।
- माता पार्वती को सुहाग की सभी सामग्री जैसे चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेंहदी आदि अर्पित करें।
- भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, अक्षत, और फूल चढ़ाएं।
- घी का दीपक जलाकर हरियाली तीज की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- अंत में आरती करें और घर के बड़ों का आशीर्वाद लें।
यह त्योहार हमें सिखाता है कि अटूट विश्वास, धैर्य और समर्पण से किसी भी कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
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