Murkhon Ki Suchi Akbar Birbal Ki Kahani

Murkhon Ki Suchi

मुगल सल्तनत के इतिहास में बादशाह अकबर और उनके चतुर मंत्री बीरबल के किस्से आज भी बड़े चाव से सुने और पढ़े जाते हैं। अकबर के दरबार में बीरबल अपने तीखे दिमाग, हाजिरजवाबी और अद्भुत बुद्धिमत्ता के लिए जाने जाते थे। जब भी बादशाह अकबर के मन में कोई अजीबोगरीब सवाल उठता, तो बीरबल अपनी चतुराई से उसका ऐसा हल निकालते कि अकबर निरुत्तर हो जाते थे। ऐसा ही एक मजेदार किस्सा है—‘मूर्खों की सूची’ (Murkhon Ki Suchi)

आइए इस बेहद मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कहानी को विस्तार से पढ़ते हैं।

बादशाह अकबर की अनोखी इच्छा

एक दिन बादशाह अकबर अपने राजदरबार में बैठे हुए थे। राजकीय कामकाज निपटाने के बाद वे थोड़े फुर्सत के पलों में थे। तभी अचानक उनके दिमाग में एक अजीब विचार आया। उन्होंने दरबार में बैठे बीरबल की तरफ देखा और कहा, “बीरबल! हमारे साम्राज्य में कई विद्वान, संगीतकार और गुणी लोग रहते हैं, जिन्हें हम अक्सर पुरस्कृत करते हैं। लेकिन क्या हमारे राज्य में मूर्ख लोग नहीं हैं?”

बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “जहांपनाह! इस दुनिया में हर तरह के लोग हैं। जहां बुद्धिमान हैं, वहीं मूर्खों की भी कोई कमी नहीं है।”

अकबर ने उत्सुकता से कहा, “तो ठीक है, हम चाहते हैं कि तुम हमारे राज्य से सबसे बड़े छह मूर्खों को ढूंढकर लाओ। हम उन्हें देखना चाहते हैं और जानना चाहते हैं कि वे किस हद तक मूर्ख हैं। हम तुम्हें इस काम के लिए एक महीने का समय देते हैं।”

बीरबल जानते थे कि यह एक अनोखा और थोड़ा अजीब काम था, लेकिन राजा की आज्ञा का पालन करना उनका कर्तव्य था। बीरबल ने सिर झुकाकर कहा, “जो आज्ञा जहांपनाह! मैं जल्द ही आपके सामने छह मूर्खों की सूची पेश करूँगा।”

बीरबल की मूर्खों की खोज

अगले ही दिन से बीरबल ने राज्य में मूर्खों की खोज शुरू कर दी। वे साधारण वेश बदलकर आगरा की गलियों और बाजारों में घूमने लगे। वे लोगों की हरकतों को बहुत ध्यान से देखते थे।

पहला मूर्ख: घोड़े पर सवार घास का गट्ठर

कुछ दिनों की खोज के बाद, बीरबल को सड़क पर एक अजीब नजारा दिखाई दिया। एक आदमी घोड़े पर बैठा हुआ था, लेकिन उसने घास का एक बड़ा सा गट्ठर अपने सिर पर रख रखा था।

बीरबल ने अपनी सवारी रोकी और उस आदमी से पूछा, “अरे भाई! तुमने यह घास का गट्ठर अपने सिर पर क्यों रखा हुआ है? इसे घोड़े की पीठ पर क्यों नहीं रख देते?”

उस व्यक्ति ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, “हुजूर! मेरा घोड़ा बहुत कमजोर और थका हुआ है। अगर मैं इस भारी गट्ठर को भी इसकी पीठ पर रख दूंगा, तो यह मेरे और गट्ठर के दोहरे बोझ से मर जाएगा। इसलिए मैंने इसका आधा बोझ अपने सिर पर उठा रखा है ताकि मेरे घोड़े को आसानी हो।”

बीरबल समझ गए कि उन्हें उनका पहला मूर्ख मिल गया है। उन्होंने उस व्यक्ति का नाम और पता अपनी डायरी में दर्ज कर लिया।

दूसरा मूर्ख: रोशनी में अंगूठी की खोज

कुछ दिनों बाद, बीरबल शाम के समय एक सुनसान सड़क से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक आदमी सड़क पर लगी एक लालटेन (स्ट्रीट लाइट) के नीचे बहुत परेशान होकर कुछ ढूंढ रहा था।

बीरबल उसके पास गए और पूछा, “भाई, क्या ढूंढ रहे हो? इतनी देर से परेशान दिख रहे हो।”

उस आदमी ने रोनी सूरत बनाकर कहा, “श्रीमान, मेरी सोने की अंगूठी खो गई है, वही ढूंढ रहा हूँ।”

बीरबल ने दया दिखाते हुए कहा, “अंगूठी कहाँ गिरी थी? क्या इसी जगह गिरी थी?”

उस आदमी ने सड़क के दूसरी तरफ इशारा करते हुए कहा, “नहीं हुजूर, अंगूठी तो उस दूर वाले अंधेरे कोने में गिरी थी। लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है, इसलिए मैं उसे यहाँ ढूंढ रहा हूँ क्योंकि यहाँ रोशनी अच्छी है।”

बीरबल उस आदमी की मूर्खता पर मन ही मन हँसे और उसका नाम-पता भी अपनी सूची में लिख लिया। इस तरह बीरबल को दूसरा मूर्ख भी मिल गया।

राजदरबार में वापसी और बड़ा खुलासा

एक महीना बीत जाने के बाद, बीरबल दरबार में हाजिर हुए। बादशाह अकबर बड़ी उत्सुकता से उनका इंतजार कर रहे थे।

अकबर ने पूछा, “बीरबल! क्या तुमने हमारे आदेशानुसार राज्य के सबसे बड़े छह मूर्खों को ढूंढ लिया? उनकी सूची कहाँ है?”

बीरबल ने धीरे से अपनी जेब से एक कागज निकाला और अकबर के हाथों में सौंप दिया।

अकबर ने सूची खोली, लेकिन उसमें केवल चार ही नाम लिखे थे। अकबर ने भौहें सिकोड़ते हुए पूछा, “बीरबल, हमने तुम्हें छह मूर्ख ढूंढने को कहा था, लेकिन इस सूची में तो केवल चार ही नाम हैं? बाकी के दो मूर्ख कहाँ हैं? और इस सूची में पहले दो नाम तो उस घुड़सवार और अंगूठी ढूंढने वाले के हैं। बाकी नाम किसके हैं?”

बीरबल ने विनम्रता से कहा, “जहांपनाह, कृपया सूची को थोड़ा और ध्यान से पढ़ें। आपको बाकी के नाम भी मिल जाएंगे।”

अकबर ने सूची को दोबारा देखा। तीसरे स्थान पर लिखा था—‘बीरबल’

अकबर चौंक गए और बोले, “बीरबल! यह क्या मजाक है? तुमने अपना नाम मूर्खों की सूची में क्यों लिखा है? क्या तुम मूर्ख हो?”

बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा, “हाँ, जहांपनाह। मैं इस राज्य का तीसरा सबसे बड़ा मूर्ख हूँ। साम्राज्य में इतने सारे महत्वपूर्ण काम, न्याय और जनकल्याण की नीतियां अधूरी पड़ी थीं, लेकिन मैं उन्हें छोड़कर एक महीने तक मूर्खों को ढूंढने में अपना कीमती समय बर्बाद करता रहा। मुझसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा?”

अकबर बीरबल की इस बात पर मुस्कुराए, लेकिन फिर उनकी नजर चौथे नाम पर पड़ी। चौथा नाम देखते ही अकबर के चेहरे का रंग उड़ गया। चौथे स्थान पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—‘शहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर’

अकबर गुस्से से लाल हो गए और बोले, “बीरबल! तुम्हारी यह जुर्रत? तुमने अपने राजा का नाम मूर्खों की सूची में लिख दिया? इसका स्पष्टीकरण दो, वरना तुम्हें इसकी कड़ी सजा भुगतनी होगी!”

बीरबल ने बिना डरे शांत स्वर में कहा, “गुस्ताखी माफ हो जहांपनाह! लेकिन आप खुद सोचिए। आप पूरे साम्राज्य के राजा हैं। आपके ऊपर करोड़ों लोगों के जीवन और सुरक्षा की जिम्मेदारी है। लेकिन उन सभी महत्वपूर्ण कार्यों को दरकिनार कर, आपने मुझे मूर्खों को खोजने के इस निरर्थक काम पर लगा दिया। एक राजा होकर ऐसा निरर्थक आदेश देना क्या मूर्खता की श्रेणी में नहीं आता?”

बीरबल की यह तर्कसंगत और निर्भीक बात सुनकर बादशाह अकबर अवाक रह गए। उनका गुस्सा तुरंत शांत हो गया। वे बीरबल की बुद्धिमानी और सच कहने के साहस से बेहद प्रभावित हुए।

अकबर जोर से हंस पड़े और बोले, “बीरबल, सचमुच तुम्हारी बुद्धिमानी का कोई सानी नहीं है। तुमने हमें हमारी गलती का अहसास बेहद शालीनता और चतुराई से करा दिया।”

बादशाह अकबर ने बीरबल को गले लगाया और उनकी हाजिरजवाबी के लिए उन्हें सोने के आभूषणों और जागीर से पुरस्कृत किया।

कहानी से सीख (Moral of the Story)

अकबर बीरबल की यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें हमेशा अपने समय और ऊर्जा का उपयोग सही और रचनात्मक कार्यों में करना चाहिए। किसी भी निरर्थक काम में समय बर्बाद करना सबसे बड़ी मूर्खता है। साथ ही, यह कहानी हमें यह भी बताती है कि सच कितना भी कड़वा क्यों न हो, उसे बुद्धिमानी और सही तरीके से सामने रखने पर हमेशा सम्मान ही मिलता है।


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