
महान मुगल सम्राट अकबर के दरबार में नौ रत्न थे, जिनमें से बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, हाजिरजवाबी और न्यायप्रियता के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। बीरबल की बुद्धिमानी के किस्से न केवल आगरा में, बल्कि पूरे साम्राज्य में बेहद चाव से सुने जाते थे। आज हम आपको अकबर और बीरबल के जीवन से जुड़ी एक ऐसी ही बेहद दिलचस्प और सीख देने वाली कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसका शीर्षक है — “जैसे को तैसा” (Tit for Tat)। यह कहानी हमें सिखाती है कि चालाकी और धोखेबाजी का अंत हमेशा बुरा होता है।
कहानी की शुरुआत: एक गरीब किसान और लालची व्यापारी
आगरा के एक छोटे से गाँव में जग्गू नाम का एक अत्यंत सीधा-साधा और ईमानदार किसान रहता था। जग्गू के पास खेती के लिए थोड़ी सी जमीन थी और एक पुराना, भारी लोहे का तराजू था, जो उसे उसके पूर्वजों से विरासत में मिला था। वह तराजू बहुत ही मजबूत और कीमती लोहे से बना हुआ था।
उसी गाँव में धनीराम नाम का एक बेहद अमीर लेकिन महा-लालची और चालाक व्यापारी भी रहता था। धनीराम हमेशा दूसरों को ठगने और अपना फायदा तलाशने की ताक में रहता था।
एक बार जग्गू को किसी जरूरी काम से अपने परिवार के साथ लंबे समय के लिए तीर्थयात्रा पर जाना पड़ा। जग्गू को अपने घर के कीमती सामानों की चिंता सताने लगी। उसने सोचा कि गाँव में धनीराम से बेहतर और सुरक्षित स्थान और कौन सा हो सकता है। वह धनीराम के पास गया और अत्यंत विनम्रता से बोला, “धनीराम भाई, मैं कुछ महीनों के लिए तीर्थयात्रा पर जा रहा हूँ। क्या तुम मेरे इस पुश्तैनी लोहे के तराजू को अपने पास अमानत के तौर पर रख लोगे? वापस आकर मैं इसे तुमसे ले लूँगा।”
धनीराम के मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि यह लोहा बहुत ही उत्तम गुणवत्ता का है और इसे बेचकर अच्छे पैसे कमाए जा सकते हैं। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे जग्गू भाई! इसमें पूछने वाली क्या बात है? तुम बेफिक्र होकर जाओ। तुम्हारी अमानत मेरे पास बिल्कुल सुरक्षित रहेगी।”
विश्वासघात और झूठ का जाल
जग्गू अपनी यात्रा पर चला गया। उधर धनीराम ने जग्गू के जाते ही उस कीमती लोहे के तराजू को बाजार में एक ऊंचे दाम पर बेच दिया और मिले हुए पैसों को अपनी तिजोरी में रख लिया।
कुछ महीनों बाद, जब जग्गू अपनी यात्रा पूरी करके वापस लौटा, तो वह सीधे धनीराम की दुकान पर पहुँचा। जग्गू ने कहा, “धनीराम भाई, मैं अपनी यात्रा से सकुशल लौट आया हूँ। यदि आप मेरा वह लोहे का तराजू मुझे वापस कर दें, तो बड़ी कृपा होगी।”
धनीराम ने अपने चेहरे पर एक झूठी उदासी लाते हुए कहा, “ओह जग्गू भाई! मैं तुम्हें कैसे बताऊं? मुझे बहुत अफसोस है। मैंने तुम्हारा तराजू बहुत संभाल कर तिजोरी वाले कमरे में रखा था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वहाँ बहुत सारे चूहे आ गए। उन दुष्ट चूहों ने तुम्हारे उस भारी लोहे के तराजू को कुतर-कुतर कर पूरी तरह खा लिया। अब वहाँ कुछ भी नहीं बचा।”
जग्गू धनीराम की इस सफेद झूठ को तुरंत भांप गया। वह जानता था कि चूहे कभी लोहे को नहीं खा सकते। लेकिन जग्गू ने गुस्सा करने के बजाय शांति से काम लेने का फैसला किया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं धनीराम भाई! इसमें तुम्हारा क्या दोष? चूहों की आदत ही ऐसी होती है। वे कुछ भी खा सकते हैं।”
जैसे को तैसा: जग्गू की योजना
अगले दिन, जग्गू दोबारा धनीराम के घर गया और बोला, “धनीराम भाई, आज मैं नदी पर स्नान करने जा रहा हूँ। क्या तुम अपने बेटे रामू को मेरे साथ भेज सकते हो? वह घाट पर मेरे कपड़ों की रखवाली कर लेगा। वापसी में मैं उसे सुंदर खिलौने दिला दूँगा।”
धनीराम ने सोचा कि जग्गू बहुत ही मूर्ख इंसान है, जो तराजू चोरी होने के बाद भी उससे इतनी भलाई से बात कर रहा है। धनीराम ने खुश होकर अपने दस साल के बेटे रामू को जग्गू के साथ भेज दिया।
नदी पर पहुँचकर, जग्गू ने रामू को चुपके से अपने एक परम मित्र के घर में छिपा दिया और उसे सख्त हिदायत दी कि वह बाहर न निकले। इसके बाद, जग्गू अकेला ही धनीराम के घर वापस आ गया।
धनीराम ने जग्गू को अकेला देखकर घबराते हुए पूछा, “जग्गू! मेरा बेटा रामू कहाँ है? वह तुम्हारे साथ क्यों नहीं लौटा?”
जग्गू ने अत्यंत दुखी चेहरा बनाते हुए कहा, “क्या बताऊं धनीराम भाई! जैसे ही हम नदी के किनारे पहुँचे, अचानक आसमान से एक विशाल चील झपट्टा मारकर नीचे आई और तुम्हारे बेटे रामू को अपने पंजों में दबाकर आसमान में उड़ गई। मैं चिल्लाता ही रह गया, पर वह उसे दूर ले गई।”
यह सुनते ही धनीराम आगबबूला हो गया और चिल्लाया, “तुम झूठ बोल रहे हो! कोई चील इतने बड़े बच्चे को कैसे उठाकर ले जा सकती है? तुम मेरे बेटे को अगवा कर चुके हो! चलो अभी महाराज अकबर के दरबार में!”
अकबर का दरबार और बीरबल का न्याय
मामला बादशाह अकबर के दीवान-ए-खास में पहुँचा। धनीराम ने रोते-बिलखते हुए अकबर से गुहार लगाई, “जहाँपनाह! इस दुष्ट जग्गू ने मेरे इकलौते बेटे का अपहरण कर लिया है और अब यह झूठ बोल रहा है कि उसे कोई चील उठाकर ले गई। कृपया मुझे न्याय दिलाएं और मेरे बेटे को ढूंढें!”
अकबर ने हैरानी से जग्गू की तरफ देखा और पूछा, “जग्गू, क्या यह सच है? तुम दरबार में ऐसा बेतुका झूठ कैसे बोल सकते हो? क्या कभी कोई चील किसी इंसान के बच्चे को उड़ाकर ले जा सकती है?”
जग्गू ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह! मुझे क्षमा करें। लेकिन यदि इस राज्य में छोटे और कमजोर चूहे कई मन भारी लोहे के तराजू को चबाकर हजम कर सकते हैं, तो फिर एक शक्तिशाली और बड़ी चील भला एक छोटे बच्चे को उठाकर क्यों नहीं उड़ सकती?”
यह सुनते ही दरबार में सन्नाटा छा गया। बादशाह अकबर असमंजस में पड़ गए। तब उन्होंने बीरबल की ओर देखा और इस गुत्थी को सुलझाने का इशारा किया।
बीरबल पूरी बात तुरंत समझ गए। उन्होंने मंद-मंद मुस्कुराते हुए धनीराम से पूछा, “धनीराम, क्या जग्गू का कहना सही है? क्या चूहों ने वास्तव में उसका लोहे का तराजू खा लिया था?”
धनीराम अब पूरी तरह से फंस चुका था। वह थर-थर कांपने लगा। उसे समझ आ गया कि उसकी चोरी पकड़ी जा चुकी है। उसने सिर झुकाकर रोते हुए अपनी गलती स्वीकार कर ली, “जहाँपनाह, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैंने लालच में आकर जग्गू का तराजू बेच दिया था और झूठ बोला था कि उसे चूहे खा गए।”
बीरबल ने कड़क आवाज में फैसला सुनाया, “धनीराम! तुमने जग्गू के साथ विश्वासघात किया, इसलिए उसने तुम्हें सबक सिखाने के लिए यह स्वांग रचा। अब यदि तुम अपना बेटा वापस चाहते हो, तो जग्गू का तराजू तुरंत लौटाओ या उसकी पूरी कीमत अदा करो।”
धनीराम ने रोते हुए तुरंत जग्गू के तराजू की पूरी कीमत चुकाई और हाथ जोड़कर माफी मांगी। जग्गू ने भी रामू को सकुशल धनीराम को सौंप दिया।
सीख (Moral): इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि “जैसे को तैसा” मिलना तय है। यदि हम किसी के साथ छल या कपट करते हैं, तो हमारे साथ भी वैसा ही व्यवहार होता है। हमेशा ईमानदारी का मार्ग अपनाना चाहिए।
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